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Kullu News: पूजा के बाद चलीं विदाई की हवाएं, अपने धाम लौटे देवता
Wed, 08 Oct 2025 11:24 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
Updated Wed, 08 Oct 2025 11:24 PM IST
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दशहरा उत्सव के समापन मौके पर देव मिलन के बाद अपने देवालय लौटते देवी -देवता।-संवाद
शंख ध्वनि और ढोल-नगाड़ों की थाप पर पूजा-अर्चना के बाद किया देवालयों का रुख
सबसे पहले लौटे निरमंड, आनी और बंजार घाटी के देवलु, चार दिन करेंगे पैदल सफर
संवाद न्यूज एजेंसी
कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के अंतिम दिन बुधवार को सुबह से ढालपुर मैदान से देवी-देवता का अपने देवालयों की ओर लौटने का क्रम शुरू हो गया।
पहले देव समाज के लोगों ने अपने-अपने देवी-देवताओं की पूजा अर्चना हर दिन की तरह अस्थायी शिविर में की। सुबह उठकर कारकून चश्मों और नलों से पानी लाए। इसके बाद शंख ध्वनि और ढोल-नगाड़ों की थाप पर पूजा-अर्चना की। पूजा-अर्चना के बाद हारियान देवी-देवताओं के साथ देवालय की ओर लौटने लगे। सबसे पहले सुबह दूरदराज क्षेत्र निरमंड, आनी और बंजार घाटी के देवलुओं ने अस्थायी शिविर समेटे और ढोल-नगाड़ों के साथ रवाना हो गए। वे पैदल अपने देवालयों तक पहुंचेंगे। इसके लिए उन्हें तीन से चार दिन का सफर करना पड़ेगा। देवी-देवता रास्ते में कई जगह रात हारियानों के साथ गुजारेंगे। अलग-अलग पड़ाव पर देवी-देवता श्रद्धालुओं के मेहमान भी बनेंगे। बुधवार को ढालपुर से रवाना हुए देवी-देवताओं के साथ करीब 100 देवी-देवता रथ यात्रा में शामिल होने के लिए अपने अस्थायी शिविर में बैठे रहे। वे रथयात्रा में शामिल होने की रिवायत निभाने के बाद लौट रहे हैं।
जिले भर से आने वाले कई देवी-देवता ऐसे हैं जिनका रथ यात्रा में शामिल होना जरूरी होता है। उनके बिना दशहरा उत्सव के समापन की प्रक्रिया पूरी नहीं होती है। देवी हिडिंबा, बिजली महादेव सहित कई देवता ऐसे हैं, जिनका उत्सव में शामिल होना जरूरी होता है।
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सबसे पहले लौटे निरमंड, आनी और बंजार घाटी के देवलु, चार दिन करेंगे पैदल सफर
संवाद न्यूज एजेंसी
कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के अंतिम दिन बुधवार को सुबह से ढालपुर मैदान से देवी-देवता का अपने देवालयों की ओर लौटने का क्रम शुरू हो गया।
पहले देव समाज के लोगों ने अपने-अपने देवी-देवताओं की पूजा अर्चना हर दिन की तरह अस्थायी शिविर में की। सुबह उठकर कारकून चश्मों और नलों से पानी लाए। इसके बाद शंख ध्वनि और ढोल-नगाड़ों की थाप पर पूजा-अर्चना की। पूजा-अर्चना के बाद हारियान देवी-देवताओं के साथ देवालय की ओर लौटने लगे। सबसे पहले सुबह दूरदराज क्षेत्र निरमंड, आनी और बंजार घाटी के देवलुओं ने अस्थायी शिविर समेटे और ढोल-नगाड़ों के साथ रवाना हो गए। वे पैदल अपने देवालयों तक पहुंचेंगे। इसके लिए उन्हें तीन से चार दिन का सफर करना पड़ेगा। देवी-देवता रास्ते में कई जगह रात हारियानों के साथ गुजारेंगे। अलग-अलग पड़ाव पर देवी-देवता श्रद्धालुओं के मेहमान भी बनेंगे। बुधवार को ढालपुर से रवाना हुए देवी-देवताओं के साथ करीब 100 देवी-देवता रथ यात्रा में शामिल होने के लिए अपने अस्थायी शिविर में बैठे रहे। वे रथयात्रा में शामिल होने की रिवायत निभाने के बाद लौट रहे हैं।
जिले भर से आने वाले कई देवी-देवता ऐसे हैं जिनका रथ यात्रा में शामिल होना जरूरी होता है। उनके बिना दशहरा उत्सव के समापन की प्रक्रिया पूरी नहीं होती है। देवी हिडिंबा, बिजली महादेव सहित कई देवता ऐसे हैं, जिनका उत्सव में शामिल होना जरूरी होता है।
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