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तीन पुण्य कर्मों का समुच्चय ही कहलाता है यज्ञ : स्वामी राम स्वरूप
Fri, 17 Apr 2026 06:56 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Fri, 17 Apr 2026 06:56 AM IST
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योल (कांगड़ा)। वेद मंदिर योल कैंप में 12 अप्रैल से प्रारंभ हुए 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के तहत चल रहे प्रवचनों में स्वामी राम स्वरूप योगाचार्य ने भक्तों को यज्ञ की वास्तविकता से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि देवपूजा, संगतिकरण एवं दानेषु इन तीन पुण्य कर्मों का समुच्चय ही यज्ञ कहलाता है।
केवल अग्नि में आहुति डालना ही यज्ञ नहीं है, बल्कि यह वेदों के अनुसार अधूरा और वेद विरुद्ध माना जाता है। यज्ञ का वास्तविक स्वरूप माता-पिता, अतिथि, आचार्य एवं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सेवा से जुड़ा हुआ है। स्वामी ने कहा कि सामवेद के मंत्र 55 और ऋग्वेद के मंत्र 10, 105 और 8 में परमेश्वर ने निर्देश दिया है कि घी से भरी हुई सुच (चम्मच) को वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ ही अग्नि में अर्पित किया जाए। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि भारत की प्राचीन संस्कृति और वेद ज्ञान की ओर दोबारा लौटें, जिससे समाज में सुख-शांति, भाईचारा और सद्गुणों का विकास संभव हो सके। संवाद
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केवल अग्नि में आहुति डालना ही यज्ञ नहीं है, बल्कि यह वेदों के अनुसार अधूरा और वेद विरुद्ध माना जाता है। यज्ञ का वास्तविक स्वरूप माता-पिता, अतिथि, आचार्य एवं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सेवा से जुड़ा हुआ है। स्वामी ने कहा कि सामवेद के मंत्र 55 और ऋग्वेद के मंत्र 10, 105 और 8 में परमेश्वर ने निर्देश दिया है कि घी से भरी हुई सुच (चम्मच) को वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ ही अग्नि में अर्पित किया जाए। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि भारत की प्राचीन संस्कृति और वेद ज्ञान की ओर दोबारा लौटें, जिससे समाज में सुख-शांति, भाईचारा और सद्गुणों का विकास संभव हो सके। संवाद
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