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आपदा जोखिम कम करने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान को नीति और शासन से जोड़ना जरूरी : प्रो. बंसल

Mon, 06 Apr 2026 07:13 AM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Mon, 06 Apr 2026 07:13 AM IST
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Integrating scientific knowledge with policy and governance is essential for disaster risk reduction: Prof. Bansal
धर्मशाला। केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश धर्मशाला में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हिमालयन होराइजन्स के दूसरे दिन आपदाओं, जलवायु परिवर्तन और उनके प्रभावों पर गहन मंथन हुआ। सत्र का शुभारंभ करते हुए कुलपति प्रो. एसपी बंसल ने कहा कि आपदाओं के बदलते स्वरूप को समझने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा जब तक वैज्ञानिक ज्ञान को नीति और शासन से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक आपदा जोखिम को प्रभावी ढंग से कम करना संभव नहीं है।
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सम्मेलन में डॉ. फिरोज ने परागकण जीवाश्मों के आधार पर उत्तराखंड में पिछले 5000 वर्षों के जलवायु परिवर्तन पर अपना शोध प्रस्तुत किया। वहीं, डॉ. आनंद शर्मा ने केदारनाथ आपदा का विश्लेषण करते हुए मौसम पूर्वानुमान की सीमाओं और प्रशासनिक चुनौतियों से जुड़े महत्वपूर्ण सबक साझा किए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सुनीत द्विवेदी ने गणितीय मॉडल के जरिए भारतीय मानसून वर्षा के वितरण का विश्लेषण प्रस्तुत किया जो भविष्य की रणनीतियों के लिए कारगर साबित हो सकता है।
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विशेषज्ञ डॉ. उपासना एस. बनर्जी ने बताया कि हिमालय न केवल भारतीय मानसून बल्कि वैश्विक वायुमंडलीय प्रणाली को भी प्रभावित करता है। सत्र के दौरान शैलेंद्र राय ने जलवायु परिवर्तन के कारण डेंगू के बढ़ते खतरे पर चिंता जताई और उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान पर जोर दिया। एनडीएमए के डॉ. अरुण कुमार ने प्रदेश में बढ़ती आपदाओं से निपटने की रणनीतियों पर चर्चा की, जबकि जेएनयू के अभिजीत द्विवेदी ने पर्यावरण कानून और विकास के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
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आपदा से सीख लेना और वैज्ञानिक आधार पर रणनीतियां ही रास्ता : प्रो. एमजी ठाकुर
धर्मशाला। हिमालयन होराइजन्स: टेक्टोनिक्स, सस्टेनेबिलिटी एंड रेजिलिएंस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के मुख्य वक्ता बिरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज लखनऊ के निदेशक प्रो. एमजी ठक्कर ने पृथ्वी तंत्र की सहनशीलता और टेक्टोनिक प्रक्रियाओं की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदाएं हमें भविष्य के लिए तैयार होने का अवसर देती हैं। इनसे सीख लेना और वैज्ञानिक आधार पर रणनीतियां बनाना ही आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने का एकमात्र रास्ता है। टेक्टोनिक हलचलों को समझना हिमालयी क्षेत्रों के लिए अत्यंत अनिवार्य है।
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