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Himachal: 23 साल बाद कांस्टेबल के सेवा लाभ बहाल, CM आवास की सुरक्षा में कथित चूक के आरोप में किया था बर्खास्त

Wed, 13 Aug 2025 05:00 AM IST
अंकेश डोगरा संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: अंकेश डोगरा Updated Wed, 13 Aug 2025 05:00 AM IST
सार

हिमाचल पुलिस के एक कांस्टेबल के सेवा लाभ को हाईकोर्ट ने बहाल करने के आदेश दिए हैं। न्यायाधीश सत्येन वैद्य की अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि जांच रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई सबूत नहीं था। जानें पूरा मामला...

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HP Police Constable service benefits restored after 23 years dismissed alleged lapse in security CM residence
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 23 साल बाद एक कांस्टेबल के सेवा लाभ को बहाल करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने कांस्टेबल की सेवा के 10 साल की वेतन वृद्धि रोकने और उसके बाद 4 साल की सेवा जब्त करने के आदेश को भी रद्द कर दिया है। कोर्ट ने 27 अक्तूबर 2002, सितंबर 2003 और 10 जून 2004 के विभाग की ओर से दंडात्मक कार्रवाई के सभी आदेशों को रद्द कर दिया है।

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न्यायाधीश सत्येन वैद्य की अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि जांच रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई सबूत नहीं था। किसी भी गवाह ने नहीं कहा था कि संदिग्ध व्यक्ति को याची होशियार सिंह ने देखा था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की उस दलील को भी सही पाया, जिसमें कहा गया था कि घुसपैठिया उनके ड्यूटी क्षेत्र में न तो अंदर आया था और न ही बाहर गया था। अदालत ने कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए कोई भी ठोस सबूत नहीं था और जांच प्रक्रिया मनमानी थी। मामला 18 फरवरी 2002 का है। जब कांस्टेबल होशियार सिंह शिमला में मुख्यमंत्री आवास पर गार्ड ड्यूटी पर तैनात था। शाम करीब 4 बजे एक व्यक्ति कथित तौर पर कांटेदार तार की बाड़ से कूदकर उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में घुस गया और कुछ ही देर में अपना बैग छोड़कर भाग गया। इस घटना के बाद होशियार सिंह और तीन अन्य कर्मियों के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू की गई।

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होशियार सिंह पर आरोप था कि वह पोस्ट नंबर पांच पर ड्यूटी के दौरान संदिग्ध व्यक्ति को देख नहीं पाए और उसे पकड़ने में नाकाम रहे और अपनी ड्यूटी को लापरवाही से निभाया। अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने जांच अधिकारी के निष्कर्ष से सहमति जताई और इसे गंभीर लापरवाही माना। इसके बाद होशियार सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें उन पर 10 साल की सेवा वेतन वृद्धि को स्थायी रूप से रोकने की सजा का प्रस्ताव था। हालांकि बाद में सजा को काम करके 4 साल की सेवा स्थायी रूप से जब्त करने का आदेश दिया गया। होशियार सिंह ने आदेश के खिलाफ विभाग के समक्ष अपील की, लेकिन उनकी अपील और उसके बाद की गई पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी गई। इसी के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया था। कोर्ट ने कहा कि जांच में निष्पक्षता की कमी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई सबूत ही नहीं था, तो सजा देना न्यायसंगत नहीं है।

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