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Himachal News: तय शर्तें बहाल करे हिमाचल या खर्च की राशि लौटाए, केंद्रीय ऊर्जा सचिव ने भेजा पत्र; जानें मामला
Sun, 16 Mar 2025 12:19 PM IST
अंकेश डोगरा
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
Published by: अंकेश डोगरा
Updated Sun, 16 Mar 2025 12:19 PM IST
सार
केंद्रीय ऊर्जा सचिव पंकज अग्रवाल ने मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना को पत्र भेज एसजेवीएन और एनएचपीसी के साथ पूर्व में तय मूल शर्तें बहाल करने को कहा है।
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मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू (फाइल फोटो)।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
केंद्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश में चार बिजली परियोजनाओं के निर्माण में देरी पर कड़ा संज्ञान लिया है। केंद्रीय ऊर्जा सचिव पंकज अग्रवाल ने मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना को पत्र भेज एसजेवीएन और एनएचपीसी के साथ पूर्व में तय मूल शर्तें बहाल करने को कहा है। ऐसा नहीं करने पर हिमाचल सरकार को ब्याज सहित खर्च की गई राशि लौटाने को कहा है।
बता दें कि प्रदेश सरकार ने इन परियोजनाओं को लेकर पूर्व सरकार के समय हुए समझौतों पर सवाल उठाते हुए कुछ संशोधन किए हैं। इस पर अब केंद्र सरकार ने आपत्ति जताई है। पत्र में कहा गया कि हिमाचल सरकार ने एसजेवीएन व एनएचपीसी के साथ समझौतों की शर्तों और नियमों में एकतरफा संशोधन किया है। इस बदलाव से लुहरी स्टेज-एक (210 मेगावाट), धौलासिद्ध (66 मेगावाट), सुन्नी बांध (382 मेगावाट) और डुगर (500 मेगावाट) सहित प्रमुख ऊर्जा परियोजनाओं की वित्तीय व्यवहार्यता को खतरा है। इन परियोजनाओं को शुरू में एसजेवीएन (लुहरी स्टेज-एक, धौलासिद्ध और सुन्नी बांध) को बिल्ड, ओन, ऑपरेट और मेंटेन (बीओओएम) मॉडल के तहत और एनएचपीसी (डुगर एचई परियोजना) को बिल्ड, ओन, ऑपरेट और ट्रांसफर (बीओओटी) आधार पर 2019 में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापनों के अनुसार सौंपा गया था।
सुन्नी बांध को बिना किसी रियायत की आवश्यकता के व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य माना गया था। लुहरी स्टेज-एक, धौलासिद्ध और डुगर परियोजनाओं को हिमाचल सरकार द्वारा दी गई विशेष रियायतों के साथ व्यवहार्य बनाया गया था। ये रियायतें जिनका उद्देश्य इन परियोजनाओं को आगे बढ़ने में मदद करना था। अब हिमाचल सरकार ने 30 सितंबर 2024 को जारी अधिसूचना में संशोधन कर पहले से सहमत शर्तों में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। ऊर्जा सचिव ने पत्र में लिखा है कि इन शर्तों के संशोधन ने गंभीर चिंताएं पैदा की हैं। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के एक आंतरिक अध्ययन से पता चला है कि रियायतों के बिना परियोजनाएं वित्तीय रूप से अव्यवहारिक हो जाएंगी।
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ऊर्जा सचिव ने प्रदेश सरकार से आग्रह किया है कि या तो एसजेवीएन और एनएचपीसी के साथ पारस्परिक रूप से सहमत मूल शर्तों को बहाल किया जाए या ऊर्जा उत्पादकों को ब्याज सहित खर्च की गई लागत की प्रतिपूर्ति की जाए और सरकार परियोजनाओं को अपने अधीन ले लें। हिमाचल सरकार इन दोनों कंपनियों के साथ दोबारा कार्यान्वयन समझौता करना चाहती है। सरकार का तर्क है कि पूर्व सरकार ने प्रदेश के हितों के खिलाफ जाकर समझौता किया।
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बता दें कि प्रदेश सरकार ने इन परियोजनाओं को लेकर पूर्व सरकार के समय हुए समझौतों पर सवाल उठाते हुए कुछ संशोधन किए हैं। इस पर अब केंद्र सरकार ने आपत्ति जताई है। पत्र में कहा गया कि हिमाचल सरकार ने एसजेवीएन व एनएचपीसी के साथ समझौतों की शर्तों और नियमों में एकतरफा संशोधन किया है। इस बदलाव से लुहरी स्टेज-एक (210 मेगावाट), धौलासिद्ध (66 मेगावाट), सुन्नी बांध (382 मेगावाट) और डुगर (500 मेगावाट) सहित प्रमुख ऊर्जा परियोजनाओं की वित्तीय व्यवहार्यता को खतरा है। इन परियोजनाओं को शुरू में एसजेवीएन (लुहरी स्टेज-एक, धौलासिद्ध और सुन्नी बांध) को बिल्ड, ओन, ऑपरेट और मेंटेन (बीओओएम) मॉडल के तहत और एनएचपीसी (डुगर एचई परियोजना) को बिल्ड, ओन, ऑपरेट और ट्रांसफर (बीओओटी) आधार पर 2019 में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापनों के अनुसार सौंपा गया था।
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सुन्नी बांध को बिना किसी रियायत की आवश्यकता के व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य माना गया था। लुहरी स्टेज-एक, धौलासिद्ध और डुगर परियोजनाओं को हिमाचल सरकार द्वारा दी गई विशेष रियायतों के साथ व्यवहार्य बनाया गया था। ये रियायतें जिनका उद्देश्य इन परियोजनाओं को आगे बढ़ने में मदद करना था। अब हिमाचल सरकार ने 30 सितंबर 2024 को जारी अधिसूचना में संशोधन कर पहले से सहमत शर्तों में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। ऊर्जा सचिव ने पत्र में लिखा है कि इन शर्तों के संशोधन ने गंभीर चिंताएं पैदा की हैं। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के एक आंतरिक अध्ययन से पता चला है कि रियायतों के बिना परियोजनाएं वित्तीय रूप से अव्यवहारिक हो जाएंगी।
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ऊर्जा सचिव ने प्रदेश सरकार से आग्रह किया है कि या तो एसजेवीएन और एनएचपीसी के साथ पारस्परिक रूप से सहमत मूल शर्तों को बहाल किया जाए या ऊर्जा उत्पादकों को ब्याज सहित खर्च की गई लागत की प्रतिपूर्ति की जाए और सरकार परियोजनाओं को अपने अधीन ले लें। हिमाचल सरकार इन दोनों कंपनियों के साथ दोबारा कार्यान्वयन समझौता करना चाहती है। सरकार का तर्क है कि पूर्व सरकार ने प्रदेश के हितों के खिलाफ जाकर समझौता किया।