{"_id":"68eb385ddf62144eca08153d","slug":"himachal-pradesh-high-court-asked-for-google-map-of-the-affected-part-of-nh-know-the-whole-matter-2025-10-12","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"HP High Court: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मांगा एनएच के प्रभावित हिस्से का गूगल मैप, जानें पूरा मामला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
HP High Court: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मांगा एनएच के प्रभावित हिस्से का गूगल मैप, जानें पूरा मामला
Sun, 12 Oct 2025 10:41 AM IST
अंकेश डोगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
Published by: अंकेश डोगरा
Updated Sun, 12 Oct 2025 10:41 AM IST
सार
Himachal Pradesh High Court: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका में प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने से पहले याचिकाकर्ताओं से प्रभावित सड़क और क्षेत्रों का गूगल साइट मैप पेश करने को कहा है। जानें विस्तार से...
विज्ञापन
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
हमीरपुर-मंडी राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ीकरण में अनियमितताओं और क्षति को लेकर हिमाचल हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने से पहले याचिकाकर्ताओं से प्रभावित सड़क और क्षेत्रों का गूगल साइट मैप पेश करने को कहा है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत से गूगल साइट मैप रिकॉर्ड पर रखने के लिए समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर दिया। इस गूगल मैप में जिला हमीरपुर और मंडी के प्रभावित गांवों, सीमाओं और सड़क की लंबाई का पता आसानी से चलेगा।
विज्ञापन
यह मुद्दा राजमार्ग के चौड़ीकरण में हो रही अनियमितताओं से संबंधित है। याचिका में आरोप लगाए गए हैं कि सड़क का चौड़ीकरण करते वक्त अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ों की 90 डिग्री की कटिंग की जा रही है। इससे सड़कों के साथ लगते पहाड़ों पर बने मकानों को नुकसान पहुंच रहा है। ठेकेदार सड़क के मलबे को हर कहीं फेंक रहे है, जिसकी वजह से अत्यधिक बारिश के दौरान लगती जमीनों का नुकसान हो रहा है। अगली सुनवाई 14 अक्तूबर को होगी। याचिका में बताया गया है कि सड़क का चौड़ीकरण करते समय कंपनियां ढलानों की कटाई, जल निकासी प्रबंधन, मलबा निपटान और पहाड़ी क्षेत्रों में ढलान स्थिरीकरण के लिए जैव-इंजीनियरिंग उपायों का उपयोग करने में नाकाम रही हैं।
विज्ञापन
याचिका में अदालत से जनता को भूस्खलन से बचाने का आग्रह किया है। अवैज्ञानिक विस्फोट और मानव जीवन को खतरे की कई रिपोर्टों के बावजूद केंद्रीय मंत्रालय ने कार्रवाई नहीं की। इसके बजाय इन कंपनियों को धनराशि जारी जारी रखी और काम को बेरोकटोक चलने दिया। गैसियां/सत्यार खड्ड (पारचू पुल) पर भारी मात्रा में अवैध रूप से मलबा डाला है और वहां एक मिट्टी का बांध बना दिया है। इस सड़क का निर्माण कार्य गावर कंस्ट्रक्शन लिमिटेड और सूर्य कंस्ट्रक्शन कंपनी सहित बीआरएम इंफ्रा प्राइवेट को सौंपा है। हाईकोर्ट में इसे लेकर हिमाचल किसान सभा और अन्य ने एक जनहित याचिका दायर की है।
आईटीबीपी जवान की बर्खास्तगी के आदेश कोर्ट ने किए खारिज
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आईटीबीपी के एक पूर्व कांस्टेबल की सेवा बर्खास्तगी के 7 नवंबर 2016 के आदेश रद्द करते हुए इसे अवैध और मनमाना बताया। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को उस तारीख से सेवामुक्त माना जाएगा, जिस तारीख को वह पेंशन योग्य सेवा पूरी करता है।
हालांकि, याचिकाकर्ता को मूल रूप से बर्खास्त किए जाने की तारीख और पेंशन योग्य सेवा पूरी होने की तारीख के बीच की अवधि का कोई पिछला वित्तीय लाभ नहीं मिलेगा। कोर्ट ने प्रतिवादियों को दो महीने के भीतर इस निर्णय के अनुसार आवश्यक कार्यवाही करने का आदेश दिया। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने कहा कि जवान ने बर्खास्तगी से पहले आईटीबीपी में 18 साल से अधिक की बेदाग सेवा दी थी। इस अवधि के दौरान उसके खिलाफ कोई शिकायत नहीं थी।
इसे देखते हुए बर्खास्तगी की सजा बहुत कठोर और असंगत थी। याचिकाकर्ता 10 सितंबर 1988 को आईटीबीपी में कांस्टेबल के पद पर तैनात हुआ। 13 दिसंबर 2005 को डयूटी के दौरान एक दुर्घटना में घायल होने के बाद उन्हें न्यूरो समस्या हुई और बाद में उन्हें दूसरी बीमारी से जूझना पड़ा। जवान 13 जनवरी 2006 से 10 फरवरी 2006 तक छुट्टी पर था, जिसके बाद उसने छुट्टी बढ़ाने के लिए आवेदन किया, जिसे स्वीकार नहीं किया गया। उन्हें 10 जुलाई 2006 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आईटीबीपी के एक पूर्व कांस्टेबल की सेवा बर्खास्तगी के 7 नवंबर 2016 के आदेश रद्द करते हुए इसे अवैध और मनमाना बताया। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को उस तारीख से सेवामुक्त माना जाएगा, जिस तारीख को वह पेंशन योग्य सेवा पूरी करता है।
हालांकि, याचिकाकर्ता को मूल रूप से बर्खास्त किए जाने की तारीख और पेंशन योग्य सेवा पूरी होने की तारीख के बीच की अवधि का कोई पिछला वित्तीय लाभ नहीं मिलेगा। कोर्ट ने प्रतिवादियों को दो महीने के भीतर इस निर्णय के अनुसार आवश्यक कार्यवाही करने का आदेश दिया। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने कहा कि जवान ने बर्खास्तगी से पहले आईटीबीपी में 18 साल से अधिक की बेदाग सेवा दी थी। इस अवधि के दौरान उसके खिलाफ कोई शिकायत नहीं थी।
इसे देखते हुए बर्खास्तगी की सजा बहुत कठोर और असंगत थी। याचिकाकर्ता 10 सितंबर 1988 को आईटीबीपी में कांस्टेबल के पद पर तैनात हुआ। 13 दिसंबर 2005 को डयूटी के दौरान एक दुर्घटना में घायल होने के बाद उन्हें न्यूरो समस्या हुई और बाद में उन्हें दूसरी बीमारी से जूझना पड़ा। जवान 13 जनवरी 2006 से 10 फरवरी 2006 तक छुट्टी पर था, जिसके बाद उसने छुट्टी बढ़ाने के लिए आवेदन किया, जिसे स्वीकार नहीं किया गया। उन्हें 10 जुलाई 2006 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
आईटीबीपी का तर्क था कि जवान 30 दिनों से अधिक समय तक अनधिकृत छुट्टी पर रहा और बार-बार बुलाने पर भी डयूटी पर वापस नहीं आया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता और उनके परिवार के सदस्यों ने बार-बार आईटीबीपी अधिकारियों को उनकी बीमारी और अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी दी थी। याचिकाकर्ता ने छुट्टी खत्म होने से पहले ही छुट्टी बढ़ाने के लिए आवेदन कर दिया था। अधिकारियों को जवान की बीमारी की जानकारी होने के बावजूद उन्होंने तथ्यों को सत्यापित करने के लिए जांच नहीं की।