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Himachal News: बीबीएमबी परियोजनाओं से लंबित वसूली मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज होगी सुनवाई

Tue, 29 Jul 2025 01:00 AM IST
अंकेश डोगरा अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: अंकेश डोगरा Updated Tue, 29 Jul 2025 01:00 AM IST
सार

प्रदेश सरकार के एक प्रवक्ता ने बताया कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में राज्य सरकार बीबीएमबी की सभी परियोजनाओं से ऊर्जा बकाया की वसूली के लिए निरंतर निरंतर गंभीर प्रयास कर रही है। पढ़ें पूरी खबर...

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Himachal News Hearing will be held in Supreme Court today in the pending recovery case from BBMB projects
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बीबीएमबी परियोजनाओं से 14 वर्षों से लंबित ऊर्जा बकाया की वसूली के लिए मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। 29 जुलाई को न्यायमूर्ति जेके महेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए यह मामला सूचीबद्ध है। कड़छम वांगतू जलविद्युत परियोजना के मामले में जेएसडब्ल्यू ऊर्जा मामले में सर्वोच्च न्यायालय में जीत हासिल करने के अब प्रदेश सरकार की नजर अब मंगलवार को होने वाली सुनवाई पर टिकी है। प्रदेश सरकार के एक प्रवक्ता ने बताया कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में राज्य सरकार बीबीएमबी की सभी परियोजनाओं से ऊर्जा बकाया की वसूली के लिए निरंतर निरंतर गंभीर प्रयास कर रही है। सरकार यह लड़ाई पिछले 14 वर्षों से लड़ रही है। यह बकाया नवंबर 1966 से या संबंधित परियोजनाओं के चालू होने की तिथि से 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी के आधार पर मांगा गया है।

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सर्वोच्च न्यायालय के 27 सितंबर 2011 के ऐतिहासिक निर्णय के बाद केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने बीबीएमबी को 1 नवंबर 2011 से हिमाचल को 7.19 प्रतिशत विद्युत आपूर्ति शुरू करने के निर्देश दिए थे। इस पर मंत्रालय ने नवंबर 1966 से अक्तूबर 2011 तक की ऊर्जा बकाया की विस्तृत रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की थी। इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य को बीबीएमबी परियोजनाओं से कुल 13,066 मिलियन यूनिट बिजली प्राप्त करने का हकदार है, जिसकी वसूली पंजाब और हरियाणा से 60ः40 के अनुपात में होनी है। उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व में दिए गए निर्णय के बावजूद भारत के अटॉर्नी जनरल और ऊर्जा मंत्रालय की ओर से ऊर्जा भुगतान की विधि को लेकर अब तक कोई स्पष्ट प्रस्तुति नहीं दी गई है। इसके चलते मामला बार-बार तकनीकी और प्रक्रियात्मक कारणों से टलता जा रहा है।

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