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इंटरनेट से पहुंच रहा है गौरेया को खतरा?

Sat, 25 Jan 2014 08:46 AM IST
राजेश कौंडल/अमर उजाला, सोलन
राजेश कौंडल/अमर उजाला, सोलन Updated Sat, 25 Jan 2014 08:46 AM IST
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goraiya in trouble

घर के आंगन में गौरेया की चहक, डालियां पर बैठे तोते और फूलों का रस चूसने के लिए भिनभिनातीं मधुमक्खियां अगली पीढ़ी को शायद किताबों में ही देखने को मिले।

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तेजी से फैल रही थ्री जी इंटरनेट सेवा ने पहाड़ी राज्य हिमाचल में गौरेया (घरेलू चिडि़या), मधुमक्खियां और तोता प्रजाति के पक्षियों के अस्तित्व पर संकट पैदा कर दिया है।
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दिल्ली, जयपुर और मुंबई में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के शोध में ये खुलासा हो चुका है। अब हिमाचल में हुए शोध में भी इसके नेगेटिव रिजल्ट निकले हैं। पर्यावरण मंत्रालय के लिए यह शोध सोलन, कंडाघाट, वाकनाघाट, चायल, कसौली क्षेत्रों में किया गया है।
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शहरों में मोबाइल टावरों के इर्द-गिर्द इन पक्षियों की संख्या न के बराबर मिली है। अब प्रदेश के मुख्य शहरों में इस पर सर्वे को किया जाएगा।

आईजीएमसी के रेडियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डा. आरजी सूद ने कहा कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन काफी खतरनाक है। इसे लेकर सर्वे हुए हैं। यह पक्षियों के लिए जानलेवा हो सकती है। बहारा विवि के इलेक्ट्रॉनिक्स विभागाध्यक्ष प्रो. रतिश कुमार ने कहा कि इस तरह का सर्वे किया गया है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के लिए अध्ययन किया जा रहा है। इसकी मंजूरी के बाद प्रदेश के मुख्य शहरों में भी सर्वे होगा।

क्या है वैज्ञानिक तर्क

3-जी मोबाइल टावर जीएसएम टावर से निकलने वाली इलेक्ट्रिक मैग्नेटिक रेडियेशन पक्षियों पर प्रभाव डालती है। जीएसएम (2-जी) नेटवर्क खतरनाक तरंगें 869-1666 मेगाहर्ट्स रेडियेशन निकलता है। वहीं, 3-जी नेटवर्क मोबाइल टॉवर से खतरनाक तरंगें 2110-2170 मेगाहर्ट्स रेडियेशन निकलती हैं।

हनी बी, गौरेया और तोते की त्वचा काफी संवेदनशील होती है। त्वचा के सेल इल्ट्रोमेग्नेटिक फील्ड रेडियेशन को जल्दी ऑब्जर्व कर लेती है जिससे कैंसर जैसी बीमारियां पनपती हैं और पक्षियों की तादाद कम होती है।


अध्ययन के दौरान 593 रिपोर्ट नेगेटिव

दिल्ली, जयपुर और बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के ताजा सर्वे में भी इसकी पुष्टि हुई है। कुल 915 अध्ययन किए गए हैं। इनमें से 593 अध्ययन की रिपोर्ट नेगेटिव आई है, जिसमें पक्षियों पर रेडियेशन का प्रभाव देखने को मिला है।

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