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गणतंत्र के प्रहरी : किसी ने खाना का किया इंतजाम तो कहीं खोल दिए घरों के दरवाजे

Thu, 22 Jan 2026 10:41 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा Updated Thu, 22 Jan 2026 10:41 PM IST
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Sentinels of the Republic: Some arranged for food, while others opened the doors of their homes.
मैहला (चंबा)। अगस्त-सिंतबर 2025 में मणिमहेश यात्रा के दौरान प्राकृतिक आपदा में दर्जनों परिवारों ने मानवता की मिसाल पेश की। कलसुई, मैहला, जांघी और अन्य आसपास के गांवों के लोगों ने फंसे श्रद्धालुओं को अपने घरों में आसरा दिया। कुछ ने खाने तो किसी ने दवाई का प्रबंध किया। ये लोग इस आपदा में घड़ी में देशभर के श्रद्धालुओं के मददगार बने और आज सामाजिक सरोकार को पहले देखते हैं।
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आपदा के समय कलसुई निवासी सुभाष ठाकुर और लक्की ठाकुर के परिवार समेत अन्य लोगों ने श्रद्धालुओं को अपने घरों में ठहराया और उनकी सेवा की। वहीं, जांघी गांव के विपन, पालू और चमन समेत अन्य परिवारों ने भी खाने और अन्य चीजों का श्रद्धालुओं के लिए प्रबंध किया।
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मैहला गांव के राजिंदर ठाकुर, विशाल शर्मा, कुलदीप, शिशु, हनिश सोनी, तनु शर्मा, कर्ण शर्मा, अनुराधा शर्मा, बेबी, मीनू, तेजिंद्र शर्मा, मुस्कान, कुलदीप, विशाल शर्मा, योगेश और भुवनेश भी श्रद्धालुओं के लिए देवदूत बने और अपने घरों में उन्हें आसरा दिया।
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कुरांह से पवन कुमार, कैलाश चंद, अनु कुमार, करियां से दीक्षा मेहरा, हरदासपुरा के मुवीन शेख, मंगला के टपूण के अजय ठाकुर और त्रिलोक के परिवारों ने श्रद्धालुओं की सेवा के लिए अपने घरों के द्वार खोल दिए और उनके लिए भोजन की व्यवस्था की। मैहला निवासी स्वामी भुवनेश्वर शर्मा ने तो श्रद्धालुओं के लिए होटल के द्वार खोल दिए। आपदा की घड़ी में मानवता की सेवा को लेकर अपना कर्तव्य निभाया।
यात्रा के दौरान स्थानीय लोगों की यह सेवा और मानवता का भाव साबित करता है कि किसी भी घड़ी में मदद के लिए हाथ बढ़ाने वाले गणतंत्र के प्रहरी हमेशा मौजूद रहते हैं।

मंदिर में सात दिन तक ठहराए
कलसुई में हाईवे को पार करते पत्थर लगने से पंजाब के युवक चोटिल हो गया। स्थानीय लोगों ने आगे आते हुए तुरंत उसे उठाकर स्थानीय व्यक्ति के घर पहुंचा प्राथमिक उपचार दिलवाया। प्राकृतिक आपदा के कारण जेएंडके के भद्रवाह से पहुंचे 400 श्रद्धालुओं के जत्थे को मैहला स्थित जालपा माता मंदिर परिसर में गद्दे बिछाकर ठहरने और मंदिर में ही भोजन की व्यवस्था करवाई। सभी श्रद्धालु सात दिन तक मंदिर परिसर में रहे।
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