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Chamba News: भरमौर-पांगी के किसानों की जेब भरेगी हींग की खेती

Sun, 19 May 2024 10:08 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा Updated Sun, 19 May 2024 10:08 PM IST
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Asafoetida cultivation will fill the pockets of farmers of Bharmour-Pangi
चंबा। जनजातीय क्षेत्र भरमौर और पांगी के खेत हींग की खुशबू से महक रहे हैं। तीन साल पहले लगाई हींग की फसल अब तैयार होने वाली है।
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ऐसे में हींग की खेती से किसानों की जेबें भरने वाली हैं। जनजातीय क्षेत्र के किसान पिछले तीन साल से हींग की खेती कर रहे हैं। हींग का पौधा चौथे वर्ष में रस छोड़ना शुरू करता है। इसी रस से हींग तैयार होती है। ऐसे में अगले साल किसानों को मेहनत का फल मिलने वाला है। किसानों का कहना है कि उन्होंने हींग के पौधों बच्चों की तरह सींचा है।
जिला चंबा में मौजूदा समय में पांगी, भरमौर और मैहला के किसान हींग की खेती कर रहे है। कृषि विभाग ने किसानों को हींग के सात हजार पौधे वितरित किए हैं। हींग की कीमत ज्यादा होने के कारण किसानों का इस ओर रुझान बढ़ रहा है। वहीं कृषि विभाग भी हींग की खेती को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। हींग की कीमत 30 से 40 हजार रुपये किलो है। भारत में इस्तेमाल के लिए हींग ईरान और अफगानिस्तान आदि देशों से आयात की जाती है। अफगानिस्तान से आने वाली हींग की मांग सबसे ज्यादा है। हींग के पौधे की जड़ से निकाले गए रस से ही हींग तैयार की जाती है। यह चार साल बाद तैयार होती है। पांगी और भरमौर के किसान तीन साल से इसकी खेती कर रहे हैं। अगले साल इसकी जड़ से रस निकाला जाएगा। इससे हींग तैयार होगी। संवाद
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कोट
कृषि विभाग के उपनिदेशक डॉ. कुलदीप धीमान ने कहा कि हींग का पौधा लगाने के लिए डेढ़ फीट तक गड्ढा तैयार किया जाता है। किसान इस बात का ध्यान रखें कि इस पौधे के आस-पास घास न उगे। इसके लिए अंग्रेजी खाद की जरूरत नहीं होती है। देसी खाद इसमें डाल सकते हैं। कच्ची हींग की बहुत तीखी गंध होती है, इसलिए उसे खाने लायक नहीं माना जाता। इसके अलावा हींग के लिए शुष्क और ठंडा वातावरण अनुकूल माना जाता है। उन्होंने बताया कि हींग के पौधे में तीन-चार महीने तक ही पत्ते रहते है। अन्य महीने में यह पौधा जमीन में दिखाई नहीं देता है। लगभग चार साल के बाद इसकी जड़ से रस निकलता है। इसे निकालने के बाद पांगी, भरमौर और मैहला के किसान अच्छी-खासी कमाई कर सकते हैं।
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