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Bilaspur News: 400 एंटी-रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन एंपुल खरीदने की प्रक्रिया शुरू

Wed, 22 Jul 2026 11:05 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर Updated Wed, 22 Jul 2026 11:05 PM IST
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Process initiated to procure 400 ampoules of anti-rabies immunoglobulin.
आपातकालीन उपचार व्यवस्था होगी और सशक्त
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कुत्ता काटने से पीड़ित मरीजों को मिलेगी राहत

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। एम्स बिलासपुर में कुत्ते एवं अन्य जानवरों के काटने के गंभीर मामलों के उपचार की सुविधा और सुदृढ़ होने जा रही है। संस्थान ने एंटी-रैबीज इम्युनोग्लोबुलिन (150 आईयू) के 400 एंपुल की खरीद के लिए निविदा जारी की है। इस खरीद के बाद अस्पताल में गंभीर श्रेणी (कैटेगरी-III) के डॉग बाइट मरीजों के लिए आवश्यक जीवनरक्षक इंजेक्शन की उपलब्धता बेहतर होगी, जिससे उपचार में देरी की संभावना कम होगी।

रैबीज एक जानलेवा बीमारी है और संक्रमित जानवर के काटने के बाद समय पर उपचार नहीं मिलने पर मरीज की जान तक जा सकती है। ऐसे मामलों में केवल एंटी-रैबीज वैक्सीन ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि गंभीर घाव होने पर एंटी-रैबीज इम्युनोग्लोबुलिन (आरआईजी) भी लगाया जाता है। यह इंजेक्शन मरीज के शरीर को तत्काल सुरक्षा प्रदान करता है और वैक्सीन के प्रभावी होने तक संक्रमण से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एम्स बिलासपुर द्वारा शुरू की गई खरीद प्रक्रिया का उद्देश्य अस्पताल में इस दवा की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना है, ताकि आपातकालीन स्थिति में आने वाले मरीजों को बिना किसी विलंब के उपचार मिल सके। इससे मरीजों और उनके परिजनों को बाहर से महंगी दवा खरीदने की परेशानी से भी राहत मिलने की उम्मीद है। एम्स प्रशासन ने दवा की गुणवत्ता को लेकर भी सख्त शर्तें तय की हैं। आपूर्ति की जाने वाली एंटी-रैबीज इम्युनोग्लोबुलिन की शेल्फ लाइफ आपूर्ति के समय कम से कम दो वर्ष अथवा कुल शेल्फ लाइफ का तीन-चौथाई शेष होना अनिवार्य होगा। इसके अलावा निर्धारित गुणवत्ता मानकों का पालन करने वाली दवा ही स्वीकार की जाएगी। विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को रैबीज संक्रमित या संदिग्ध कुत्ते, बंदर, बिल्ली अथवा अन्य स्तनधारी जानवर ने गंभीर रूप से काटा हो और गहरे घाव बने हों, तो ऐसे मामलों में केवल एंटी-रेबीज वैक्सीन पर्याप्त नहीं होती। मरीज को एंटी-रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन भी दिया जाता है, जो घाव के आसपास लगाकर संक्रमण के शुरुआती खतरे को कम करता है। समय पर यह उपचार मिलने से रैबीज जैसी घातक बीमारी से बचाव की संभावना काफी बढ़ जाती है।
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