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Bilaspur News: यथास्थिति आदेश के उल्लंघन का ठोस प्रमाण नहीं, निचली अदालत का फैसला पलटा
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जिला अदालत ने 50 हजार रुपये मुआवजा, कारावास और जमीन कुर्क रखने के आदेश किए रद्द
कहा- संदेह के आधार पर नहीं हो सकती दंडात्मक कार्रवाई
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। जमीन विवाद में अदालत के यथास्थिति बनाए रखने के आदेश का उल्लंघन ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं होने पर जिला अदालत ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए 50 हजार रुपये मुआवजा देने, मुआवजा नहीं देने पर 30 दिन के साधारण कारावास और एक साल तक जमीन में हिस्सा कुर्क रखने के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि न्यायालय के आदेश की जानकारी होना और उसके उल्लंघन को साबित करना अलग-अलग बातें हैं। महज संभावना या संदेह के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
मामला झंडूता तहसील के कुठेड़ा गांव की जमीन से जुड़ा है। जमीन को लेकर दीवानी मुकदमा चल रहा था। 30 जून 2016 को अदालत ने दोनों पक्षों को जमीन की प्रकृति, कब्जे और निर्माण के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। संबंधित पक्ष उस दिन अदालत में मौजूद था। इसलिए जिला अदालत ने माना कि उसे आदेश की जानकारी थी।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आदेश के बावजूद तीन जुलाई 2016 को संबंधित पक्ष जमीन पर पहुंचा और लकड़ी के खंभे व ईंधन की लकड़ी डालकर कब्जे में हस्तक्षेप किया। सीमा चिह्न हटाने और तार क्षतिग्रस्त करने का भी आरोप लगाया गया। चार जुलाई को पंचायत प्रतिनिधियों ने मौके का दौरा किया था। इसके बाद अदालत में आदेश की अवहेलना को लेकर कार्रवाई की मांग की गई।
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निचली अदालत ने आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। मुआवजा नहीं देने पर 30 दिन के साधारण कारावास और एक साल तक जमीन में हिस्से को कुर्क रखने का निर्देश दिया गया था। इसके खिलाफ जिला अदालत में अपील की गई। जिला अदालत ने गवाहों की गवाही और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि संबंधित पक्ष को अदालत के आदेश की जानकारी थी, लेकिन उसके उल्लंघन का स्पष्ट प्रमाण नहीं है। एक गवाह ने जिरह में स्वीकार किया कि उसे मौके की खसरा संख्या और जमीन के क्षेत्रफल की जानकारी नहीं थी। दूसरे गवाह ने पंचायत रिकॉर्ड के एक हिस्से के बाद में लिखे जाने की बात स्वीकार की। अदालत ने कहा कि खंभे हटाए जाने और तार क्षतिग्रस्त होने की बात से यह साबित नहीं होता कि यह काम संबंधित पक्ष ने ही किया था। यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि घटना उसी जमीन पर हुई, जिस पर यथास्थिति का आदेश लागू था। अदालत ने कहा कि दंडात्मक परिणाम गंभीर होते हैं, इसलिए उल्लंघन स्पष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित होना चाहिए। मजबूत संदेह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। जिला अदालत ने 28 मई 2025 के निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए आवेदन खारिज कर दिया। इसके साथ ही 50 हजार रुपये मुआवजा, 30 दिन के कारावास और जमीन का हिस्सा एक साल तक कुर्क रखने के सभी निर्देश समाप्त कर दिए गए। दोनों पक्षों को अपना-अपना खर्च वहन करने के आदेश दिए गए।
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कहा- संदेह के आधार पर नहीं हो सकती दंडात्मक कार्रवाई
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। जमीन विवाद में अदालत के यथास्थिति बनाए रखने के आदेश का उल्लंघन ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं होने पर जिला अदालत ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए 50 हजार रुपये मुआवजा देने, मुआवजा नहीं देने पर 30 दिन के साधारण कारावास और एक साल तक जमीन में हिस्सा कुर्क रखने के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि न्यायालय के आदेश की जानकारी होना और उसके उल्लंघन को साबित करना अलग-अलग बातें हैं। महज संभावना या संदेह के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
मामला झंडूता तहसील के कुठेड़ा गांव की जमीन से जुड़ा है। जमीन को लेकर दीवानी मुकदमा चल रहा था। 30 जून 2016 को अदालत ने दोनों पक्षों को जमीन की प्रकृति, कब्जे और निर्माण के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। संबंधित पक्ष उस दिन अदालत में मौजूद था। इसलिए जिला अदालत ने माना कि उसे आदेश की जानकारी थी।
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शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आदेश के बावजूद तीन जुलाई 2016 को संबंधित पक्ष जमीन पर पहुंचा और लकड़ी के खंभे व ईंधन की लकड़ी डालकर कब्जे में हस्तक्षेप किया। सीमा चिह्न हटाने और तार क्षतिग्रस्त करने का भी आरोप लगाया गया। चार जुलाई को पंचायत प्रतिनिधियों ने मौके का दौरा किया था। इसके बाद अदालत में आदेश की अवहेलना को लेकर कार्रवाई की मांग की गई।
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निचली अदालत ने आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। मुआवजा नहीं देने पर 30 दिन के साधारण कारावास और एक साल तक जमीन में हिस्से को कुर्क रखने का निर्देश दिया गया था। इसके खिलाफ जिला अदालत में अपील की गई। जिला अदालत ने गवाहों की गवाही और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि संबंधित पक्ष को अदालत के आदेश की जानकारी थी, लेकिन उसके उल्लंघन का स्पष्ट प्रमाण नहीं है। एक गवाह ने जिरह में स्वीकार किया कि उसे मौके की खसरा संख्या और जमीन के क्षेत्रफल की जानकारी नहीं थी। दूसरे गवाह ने पंचायत रिकॉर्ड के एक हिस्से के बाद में लिखे जाने की बात स्वीकार की। अदालत ने कहा कि खंभे हटाए जाने और तार क्षतिग्रस्त होने की बात से यह साबित नहीं होता कि यह काम संबंधित पक्ष ने ही किया था। यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि घटना उसी जमीन पर हुई, जिस पर यथास्थिति का आदेश लागू था। अदालत ने कहा कि दंडात्मक परिणाम गंभीर होते हैं, इसलिए उल्लंघन स्पष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित होना चाहिए। मजबूत संदेह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। जिला अदालत ने 28 मई 2025 के निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए आवेदन खारिज कर दिया। इसके साथ ही 50 हजार रुपये मुआवजा, 30 दिन के कारावास और जमीन का हिस्सा एक साल तक कुर्क रखने के सभी निर्देश समाप्त कर दिए गए। दोनों पक्षों को अपना-अपना खर्च वहन करने के आदेश दिए गए।