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Bilaspur News: राजा विजय चंद के काल के मंडलोहू परोह को बनाएं सांस्कृतिक धरोहर
Thu, 01 May 2025 11:31 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Thu, 01 May 2025 11:31 PM IST
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राजा विजय चंद के शासन काल में बना मंडलोहु परोह। संवाद
-नौणी और कोठीपुरा पंचायत की सीमा पर स्थित ऐतिहासिक पड़ाव आज भी है सुरक्षित
- भाषा एवं संस्कृति विभाग से उठाई जा रही है ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण की मांग
-माह की दाल का मसाला बनाकर की गई थी परोह के निर्माण की चिनाई
-150 साल बाद भी अपनी जगह से नहीं हटे इसके एक भी ईंट और पत्थर
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। बिलासपुर सदर विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत नौणी और श्री नयना देवी जी विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत कोठीपुरा की सीमा पर स्थित मंडलोहू गांव में एक ऐतिहासिक धरोहर अपनी पहचान और अस्तित्व को लेकर आज भी खड़ी है। यह धरोहर कहलूर रियासत के 43वें राजा विजय चंद के शासनकाल की निशानी है, जिसे मंडलोहू परोह के नाम से जाना जाता है।
राजा विजय चंद का शासनकाल 1889 ईस्वी से शुरू हुआ था और उन्होंने अपने समय में कई मार्गों का निर्माण करवाया। इन्हीं मार्गों में से एक रास्ता मंडलोहू गांव से होकर गुजरता था, जिससे होकर राजा कुलदेवी माता संगीरठी देवी के मंदिर, बागल, नालागढ़, कुठाड़, धामी, अर्की, जुब्बल और कोटखाई की ओर जाया करते थे। यह रास्ता केवल राजसी यात्रा के लिए ही नहीं बल्कि आम लोगों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। यात्रियों और आमजन को राह में विश्राम और पानी की सुविधा देने के उद्देश्य से इस मार्ग पर पड़ाव बनाए गए थे। मंडलोहु परोह भी ऐसा ही एक पड़ाव था।
इसे कांगड़ा जिले के पीर सलूही गांव निवासी लेहणु मल ठाकुर ने राजा विजय चंद की प्रेरणा और कृपा से बनवाया था। परोह का निर्माण उस समय माह की दाल के मसाले से चिनवाई करके किया गया था। लगभग 150 साल बाद भी इसकी एक भी ईंट या पत्थर अपनी जगह से नहीं हटी है, जो इसकी मजबूती और निर्माण कला को दर्शाता है। भाखड़ा विस्थापित सभा मंडी मानवा के अध्यक्ष रमेश चंद कौंडल ने कहा कि यह परोह उस दौर की सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवस्था की गवाही देता है जब लोग पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते थे। ऐसे में मंडलोहु परोह जैसे स्थान उन्हें न केवल ठहराव देते थे, बल्कि सामाजिक मेलजोल का भी माध्यम बनते थे।
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उन्होंने कहा कि परोह के पास आज भी एक विशाल पीपल का पेड़ खड़ा है, जिसके नीचे राजाओं ने एक बड़ा थला बनवाया था। इसी पीपल थले पर लोग बैठते, गठड़ी में बंधा खाना खोलते और परोह में रखे ठंडे पानी के घड़ों से पानी लेकर भोजन करते थे। ऐसा ही एक अन्य थला नोआ का थला भी राजपुरा पंचायत में स्थित है। रमेश कौंडल समेत क्षेत्र के कई लोगों ने भाषा एवं संस्कृति विभाग से मांग की है कि मंडलोहू परोह का मौके पर निरीक्षण कर इसे प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में शामिल किया जाए। अगर इसे संरक्षित किया गया तो आने वाली पीढ़ियां न केवल अपने इतिहास से जुड़ सकेंगी, बल्कि यह स्थान पर्यटन की दृष्टि से भी अहम बन सकता है।
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- भाषा एवं संस्कृति विभाग से उठाई जा रही है ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण की मांग
-माह की दाल का मसाला बनाकर की गई थी परोह के निर्माण की चिनाई
-150 साल बाद भी अपनी जगह से नहीं हटे इसके एक भी ईंट और पत्थर
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। बिलासपुर सदर विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत नौणी और श्री नयना देवी जी विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत कोठीपुरा की सीमा पर स्थित मंडलोहू गांव में एक ऐतिहासिक धरोहर अपनी पहचान और अस्तित्व को लेकर आज भी खड़ी है। यह धरोहर कहलूर रियासत के 43वें राजा विजय चंद के शासनकाल की निशानी है, जिसे मंडलोहू परोह के नाम से जाना जाता है।
राजा विजय चंद का शासनकाल 1889 ईस्वी से शुरू हुआ था और उन्होंने अपने समय में कई मार्गों का निर्माण करवाया। इन्हीं मार्गों में से एक रास्ता मंडलोहू गांव से होकर गुजरता था, जिससे होकर राजा कुलदेवी माता संगीरठी देवी के मंदिर, बागल, नालागढ़, कुठाड़, धामी, अर्की, जुब्बल और कोटखाई की ओर जाया करते थे। यह रास्ता केवल राजसी यात्रा के लिए ही नहीं बल्कि आम लोगों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। यात्रियों और आमजन को राह में विश्राम और पानी की सुविधा देने के उद्देश्य से इस मार्ग पर पड़ाव बनाए गए थे। मंडलोहु परोह भी ऐसा ही एक पड़ाव था।
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इसे कांगड़ा जिले के पीर सलूही गांव निवासी लेहणु मल ठाकुर ने राजा विजय चंद की प्रेरणा और कृपा से बनवाया था। परोह का निर्माण उस समय माह की दाल के मसाले से चिनवाई करके किया गया था। लगभग 150 साल बाद भी इसकी एक भी ईंट या पत्थर अपनी जगह से नहीं हटी है, जो इसकी मजबूती और निर्माण कला को दर्शाता है। भाखड़ा विस्थापित सभा मंडी मानवा के अध्यक्ष रमेश चंद कौंडल ने कहा कि यह परोह उस दौर की सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवस्था की गवाही देता है जब लोग पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते थे। ऐसे में मंडलोहु परोह जैसे स्थान उन्हें न केवल ठहराव देते थे, बल्कि सामाजिक मेलजोल का भी माध्यम बनते थे।
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उन्होंने कहा कि परोह के पास आज भी एक विशाल पीपल का पेड़ खड़ा है, जिसके नीचे राजाओं ने एक बड़ा थला बनवाया था। इसी पीपल थले पर लोग बैठते, गठड़ी में बंधा खाना खोलते और परोह में रखे ठंडे पानी के घड़ों से पानी लेकर भोजन करते थे। ऐसा ही एक अन्य थला नोआ का थला भी राजपुरा पंचायत में स्थित है। रमेश कौंडल समेत क्षेत्र के कई लोगों ने भाषा एवं संस्कृति विभाग से मांग की है कि मंडलोहू परोह का मौके पर निरीक्षण कर इसे प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में शामिल किया जाए। अगर इसे संरक्षित किया गया तो आने वाली पीढ़ियां न केवल अपने इतिहास से जुड़ सकेंगी, बल्कि यह स्थान पर्यटन की दृष्टि से भी अहम बन सकता है।