{"_id":"6a5d13d074086ad6150594b8","slug":"convicts-appeal-in-cheque-bounce-case-dismissed-bilaspur-news-c-92-1-ssml1001-163939-2026-07-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bilaspur News: चेक बाउंस मामले में दोषी की अपील खारिज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bilaspur News: चेक बाउंस मामले में दोषी की अपील खारिज
विज्ञापन
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत ने सुनाया फैसला
तीन माह कैद और 2.50 लाख रुपये मुआवजा बरकरार
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। अपीलीय अदालत ने नौ वर्ष पुराने चेक बाउंस मामले में दोषी की अपील खारिज कर दी है। निचली अदालत द्वारा सुनाई गई तीन माह के साधारण कारावास और 2.50 लाख रुपये मुआवजे की सजा को बरकरार रखा गया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत ने यह फैसला सुनाया है। आरोपी को एसीजेएम घुमारवीं की अदालत में आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए गए हैं। यह मामला बरोटा हरिजन कृषि ग्राम सेवा सहकारी समिति से संबंधित है। समिति के सचिव ने वर्ष 2017 में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, आरोपी ने मार्च 2014 में समिति से एक लाख रुपये का ऋण लिया था। इस ऋण पर 13 फीसदी वार्षिक ब्याज तय था। निर्धारित अवधि में ऋण का भुगतान न होने पर आरोपी ने 13 सितंबर 2017 को दो लाख रुपये का चेक जारी किया। यह चेक 15 सितंबर 2017 को अपर्याप्त धनराशि की टिप्पणी के साथ अनादरित हो गया। इसके बाद 16 अक्तूबर 2017 को कानूनी नोटिस भेजा गया, लेकिन आरोपी ने न तो राशि अदा की और न ही नोटिस का कोई जवाब दिया। शिकायत पर परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत न्यायालय में मामला दर्ज किया गया। सुनवाई के दौरान आरोपी ने ऋण लेने की बात स्वीकार की। हालांकि, उसने दावा किया कि ब्याज दर छह फीसदी थी और चेक केवल सुरक्षा के लिए दिया गया था। आरोपी ने कानूनी नोटिस मिलने से भी इन्कार किया। अपीलीय अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी ऋण लेने और चेक पर अपने हस्ताक्षर होने से इन्कार नहीं कर सका। अदालत ने पाया कि आरोपी अपने दावों को साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया। ऐसे में उसके तर्क केवल दावे बनकर रह गए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजने के पर्याप्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखे हैं। नोटिस उसी पते पर भेजा गया जहां आरोपी को अदालत के समन भी प्राप्त हुए थे। इसलिए नोटिस प्राप्त न होने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि हस्ताक्षरित चेक वैध देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया माना जाता है। इस कानूनी धारणा को साक्ष्यों के आधार पर खंडित करने का दायित्व आरोपी का था, लेकिन वह ऐसा करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने चेक के माध्यम से होने वाले वित्तीय लेनदेन में लोगों का विश्वास बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया। निचली अदालत द्वारा सुनाई गई तीन माह के साधारण कारावास की सजा को परिस्थितियों के अनुरूप ठहराया गया। 2.50 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी बरकरार रखा गया। अदालत ने कहा कि इस सजा में किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। यदि आरोपी निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो निचली अदालत कानून के अनुसार उसकी सजा की तामील सुनिश्चित करेगी।
विज्ञापन
तीन माह कैद और 2.50 लाख रुपये मुआवजा बरकरार
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। अपीलीय अदालत ने नौ वर्ष पुराने चेक बाउंस मामले में दोषी की अपील खारिज कर दी है। निचली अदालत द्वारा सुनाई गई तीन माह के साधारण कारावास और 2.50 लाख रुपये मुआवजे की सजा को बरकरार रखा गया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत ने यह फैसला सुनाया है। आरोपी को एसीजेएम घुमारवीं की अदालत में आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए गए हैं। यह मामला बरोटा हरिजन कृषि ग्राम सेवा सहकारी समिति से संबंधित है। समिति के सचिव ने वर्ष 2017 में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, आरोपी ने मार्च 2014 में समिति से एक लाख रुपये का ऋण लिया था। इस ऋण पर 13 फीसदी वार्षिक ब्याज तय था। निर्धारित अवधि में ऋण का भुगतान न होने पर आरोपी ने 13 सितंबर 2017 को दो लाख रुपये का चेक जारी किया। यह चेक 15 सितंबर 2017 को अपर्याप्त धनराशि की टिप्पणी के साथ अनादरित हो गया। इसके बाद 16 अक्तूबर 2017 को कानूनी नोटिस भेजा गया, लेकिन आरोपी ने न तो राशि अदा की और न ही नोटिस का कोई जवाब दिया। शिकायत पर परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत न्यायालय में मामला दर्ज किया गया। सुनवाई के दौरान आरोपी ने ऋण लेने की बात स्वीकार की। हालांकि, उसने दावा किया कि ब्याज दर छह फीसदी थी और चेक केवल सुरक्षा के लिए दिया गया था। आरोपी ने कानूनी नोटिस मिलने से भी इन्कार किया। अपीलीय अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी ऋण लेने और चेक पर अपने हस्ताक्षर होने से इन्कार नहीं कर सका। अदालत ने पाया कि आरोपी अपने दावों को साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया। ऐसे में उसके तर्क केवल दावे बनकर रह गए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजने के पर्याप्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखे हैं। नोटिस उसी पते पर भेजा गया जहां आरोपी को अदालत के समन भी प्राप्त हुए थे। इसलिए नोटिस प्राप्त न होने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि हस्ताक्षरित चेक वैध देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया माना जाता है। इस कानूनी धारणा को साक्ष्यों के आधार पर खंडित करने का दायित्व आरोपी का था, लेकिन वह ऐसा करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने चेक के माध्यम से होने वाले वित्तीय लेनदेन में लोगों का विश्वास बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया। निचली अदालत द्वारा सुनाई गई तीन माह के साधारण कारावास की सजा को परिस्थितियों के अनुरूप ठहराया गया। 2.50 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी बरकरार रखा गया। अदालत ने कहा कि इस सजा में किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। यदि आरोपी निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो निचली अदालत कानून के अनुसार उसकी सजा की तामील सुनिश्चित करेगी।
विज्ञापन