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Bilaspur News: कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन की चौड़ाई में गड़बड़ी मामले में विवाद बढ़ा

Sun, 09 Nov 2025 11:29 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 09 Nov 2025 11:29 PM IST
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Controversy escalates over irregularities in the width of the Kiratpur-Nerchowk four-lane.
फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव ने उठाया सवाल
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भू-अर्जन अधिकारी और तहसीलदार की चुप्पी से बढ़ा विवाद
कार्रवाई न होने पर समिति ने दी मामले को हाईकोर्ट ले जाने की चेतावनी

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन परियोजना के मौजा धराड़सानी में सड़क चौड़ाई को लेकर उत्पन्न विवाद अब और गंभीर हो गया है। फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव ने इस मामले में विशेष भूमि अधिग्रहण इकाई और तहसील झंडूता प्रशासन पर कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मुआवजा आवंटन प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई और राजस्व अधिकारी अब जवाब देने से बच रहे हैं।
महासचिव ने बताया कि विवादित खसरा नंबर 492/419 व 565/493/201//3 की चौड़ाई को लेकर स्वयं इकाई के राजस्व कर्मचारियों ने पहले 32 कर्म (45 मीटर) सड़क चौड़ाई की पुष्टि की थी और रिपोर्ट संख्या 375 के माध्यम से डीसी बिलासपुर को भेजी भी थी। इसी के आधार पर भूमि का इंतकाल केंद्र सरकार के नाम दर्ज किया गया, जिसे तहसीलदार ने प्रभावित भू मालिकों को बिना सूचना दिए तस्दीक कर दिया। अब वही अधिकारी यह स्पष्ट नहीं कर पा रहे कि मुआवजा 32 कर्म (45 मीटर) या 27 कर्म (38 मीटर) चौड़ाई के आधार पर दिया गया। यही नहीं, मुसाबी और मोमी अक्श में दर्ज अधिग्रहित भूमि के क्षेत्रफल में भी अंतर पाया गया है। उनका कहना है कि कुछ खसरा नंबरों में 44 कर्म की जगह 54 कर्म भूमि अधिग्रहीत दिखाकर केंद्र के नाम इंतकाल कर दिया गया, जिससे मुआवजे की गणना पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
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कहा कि इस प्रकरण की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 20 सितंबर 2025 को एसडीएम झंडूता ने फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति की शिकायत पर मौके का निरीक्षण किया था। रिपोर्ट में पाया गया कि सड़क की चौड़ाई 27 कर्म (38 मीटर) है, जो केंद्र की अधिसूचना में दर्ज 45 मीटर से आठ मीटर कम है।
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उन्होंने कहा कि एसडीएम ने सड़क की चौड़ाई को दुरुस्त करने और सुरक्षा मानकों का पालन करने के निर्देश जारी किए थे, लेकिन विशेष भूमि अधिग्रहण इकाई अब तक उनकी अनुपालना नहीं कर पाई है। परियोजना निदेशक एनएचएआई मंडी ने भी कई बार लिखित रूप में इस स्थल को सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील बताया है। अब समिति इस मामले को लेकर उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने जा रही है। उनका कहना है कि सड़क चौड़ाई के सही निर्धारण और मुआवजा प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित किए बिना इस परियोजना को सुरक्षित नहीं माना जा सकता। सवाल उठाया कि यदि सड़क सुरक्षा में कमी के कारण भविष्य में कोई दुर्घटना या जान-माल की क्षति होती है, तो इसकी जिम्मेदारी किस पर तय की जाएगी। तहसील प्रशासन, भू अर्जन अधिकारी या वह इकाई जिसने रिकॉर्ड और वास्तविकता में अंतर पैदा किया है?
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