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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 10 साल पुराने हत्या मामले में आरोपी बरी, उम्रकैद निरस्त

Tue, 20 Jan 2026 10:33 PM IST
राहुल तिवारी अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर Published by: राहुल तिवारी Updated Tue, 20 Jan 2026 10:33 PM IST
सार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 10 साल पुराने हत्या मामले में आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी साबित नहीं कर सका। केवल मेमोरेण्डम बयान और बरामदगी के आधार पर हत्या में सजा नहीं दी जा सकती।
 

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Chhattisgarh High Court acquitted accused in 10 year old murder case
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट - फोटो : highcourt.cg.gov.in

विस्तार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हत्या के एक 10 साल पुराने मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी स्थापित करने में पूरी तरह असफल रहा है। सिर्फ मेमोरेण्डम बयान और बरामदगी के आधार पर हत्या जैसे गंभीर अपराध में सजा नहीं दी जा सकती।

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हाईकोर्ट के जस्टिस संजय के. अग्रवाल और अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की डिवीजन बेंच ने सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया और आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस के समक्ष आरोपी द्वारा दिया गया कबूलनामा कानूनन साक्ष्य नहीं है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मेमोरेण्डम में सिर्फ वही हिस्सा मान्य होता है, जिससे कोई तथ्य खोजा गया हो, न कि अपराध स्वीकार करने वाला बयान।

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8 नवंबर 2013 की सुबह धमतरी जिले के बोरीदखुर्द गांव में खेत के पास युवती बितवन यादव की हत्या की गई थी। आरोप था कि बीरबल कोर्राम और एक फरार सह-आरोपी ने युवती के पैर रस्सी से बांधकर उसका सिर कीचड़ में दबाया, जिससे दम घुटने से उसकी मौत हो गई। मामले में पुलिस ने हत्या का केस दर्ज कर बीरबल कोर्राम को गिरफ्तार किया था। सत्र न्यायालय ने 18 मई 2015 को आरोपी को धारा 302/34 आईपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

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आरोपी की ओर से दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने तीन मुख्य आधारों की जांच की, जिसमें आरोपी का मेमोरेण्डम बयान, बयान के आधार पर रस्सी की बरामदगी और मृतका का मोबाइल फोन बरामद होना। कोर्ट ने कहा कि रस्सी की बरामदगी यह साबित नहीं करती कि उसी रस्सी का उपयोग हत्या में किया गया। अभियोजन यह नहीं दिखा सका कि बरामद रस्सी का मृतका की हत्या से कोई सीधा संबंध था।

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि यह साबित नहीं किया गया कि बरामद मोबाइल मृतका का ही था। न तो सिम मृतका के नाम का था और न ही मोबाइल खरीद का कोई प्रमाण पेश किया गया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले शरद बर्डीचंद सरडा बनाम महाराष्ट्र राज्य का हवाला देते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों में प्रत्येक कड़ी का मजबूत होना जरूरी है, जो इस मामले में नहीं हुआ।

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