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दो तिथियां एक साथ, मां चंद्रघंटा और कूष्मांडा की पूजा आज

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 09 Oct 2021 12:30 AM IST
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Two dates together, Chandraghanta and Kushmanda prayer  today, Yamunanagar
नवरात्र के दौरान कैंप स्थित घर में सजाया गया मंदिर। संवाद - फोटो : Yamuna Nagar
संवाद न्यूज एजेंसी
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यमुनानगर। नवरात्र के पावन पर्व में मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इस बार शारदीय नवरात्र के कुल आठ दिन ही हैं। तृतीया और चतुर्थ तिथि एक ही दिन पड़ रही है, शनिवार को ही तीसरा व चौथा नवरात्र होगा, इस पर माता के तृतीय स्वरूप चंद्रघंटा व चतुर्थ स्वरूप कूष्मांडा की पूजा की जाएगी। इस दौरान तृतीय तिथि सुबह 7 बजकर 38 मिनट तक रहेगी। इसके बाद चतुर्थ तिथि आरंभ हो जाएगी। एक ही दिन दोनों तिथियों का योग साधक को अभूर्त फल देगा।
बुड़िया निवासी ज्योतिषाचार्य एवं पंडित ललित शर्मा ने बताया कि मां के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा के नाम से जाना जाता है। इनका वाहन सिंह है और दस हाथ हैं। इनके चार हाथों में कमल फूल, धनुष, जप माला और बाण है। पांचवा हाथ अभय मुद्रा में रहता है। वहीं, चार हाथों में त्रिशूल, गदा, कमंडल और खड्ग है। पांचवां हाथ वरद मुद्रा में रहता है। पौराणिक मान्यता है कि मां का यह स्वरूप बेहद मंगलकारी और जन जन का कल्याण करने वाला है।
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उन्होंने बताया कि पूजन करते समय चौकी पर मां चंद्रघंटा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। गंगाजल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें। इसके बाद चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी का घड़ा रख दें। इस पर लाल चुनरी या कलवा बांधकर नारियल रख दें। इसके पश्चात पूजा का संकल्प लें। वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों से मां चंद्रघंटा सहित सभी देवताओं की षोड्शोपचार पूजा करें। पूजा के दौरान आवाह्न, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दूर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प हार, सुगंधितद्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्रपुष्पांजलि अर्पित करें। मां चंद्रघंटा को खीर या दुग्ध मिष्ठान का ही भोग लगाया जाता है।
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हरियाबांस निवासी पंडित महेश शांडिल्य बताते हैं कि मां दुर्गा के चौथे स्वरूप को कूष्मांडा कहते हैं। उनका सूर्य के समान तेजस्वी स्वरूप व उनकी आठ भुजाएं हमें कर्मयोगी जीवन अपनाकर तेज अर्जित करने की प्रेरणा देती है। उनकी मधुर मुस्कान हमारी जीवनी शक्ति का संवर्धन करते हुए हमें हंसते हुए कठिन से कठिन मार्ग पर चलकर सफलता पाने को प्रेरित करती है। मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान हमें आत्मिक प्रकाश प्रदान करते हुए हमारी प्रज्ञा शक्ति को जाग्रत करके हमारी मेधा को उचित तथा श्रेष्ठ कार्यों में प्रवृत्त करता है। मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं। इनके सात हाथों में कमंडल, धनुष बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। मां का वाहन सिंह है।

पंडित महेश शांडिल्य ने बताया कि सर्व प्रथम चौकी पर मां की प्रतिमा एवं चित्र सुसजिज्त करें। गोमूत्र एवं गंगाजल से इसे शुद्ध करें। इसके बाद मां के सम्मुख दीप व धूप जलाएं और पुष्प अर्पित करें। मां का ध्यान करते हुए मंत्र उचारण करें। पूजन के दौरान आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दूर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा अर्पित कर आरती करें।
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