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Yamuna Nagar News: साध्वी ने साधक के गुणों का किया बखान
Mon, 24 Jun 2024 03:58 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 24 Jun 2024 03:58 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग हुआ। सत्संग में काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। इस दौरान आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी मयंका भारती ने प्रवचन किया। प्रवचन मेंं उन्होंने साधक के गुणों का बखान किया। उन्होंने कहा कि एक साधारण मनुष्य साधक की उपाधि तभी प्राप्त करता है, जब वह अहंकार रहित भाव से संत की शरणागति होकर ब्रह्म ज्ञान की दीक्षा प्राप्त कर लेता है।
उन्होंने बताया कि दीक्षा प्राप्त करना ही काफी नहीं है, बल्कि उस पर निरंतर गुरु आज्ञा में ध्यान साधना की गहराइयों में उस परमात्मा के प्रकाश स्वरूप से जुड़ता है। सहजता से ही अग्नि का संग करने से उष्णता प्राप्त होती है और जल का संग करने से शीतलता मिलती है। उसी प्रकार पूर्ण गुरु का संग करने से जो सद्गुण प्राप्त होते हैं। वे ही साधक के ऐसे गुण हैं जो हमारे जीवन को मूल्यवान और विलक्षण बनाते हैं।
मिट्टी में शीतलता के गुण तभी आते हैं जब वह कुम्हार के हाथों में आकार लेकर अग्नि में तपाई जाती है। उसी तरह हमारे भीतर भी साधक के गुण गहन प्रक्रिया से प्रकट होते हैं। प्रेम, धैर्य, संयम, पवित्रता, सहिष्णुता और विनम्रता इत्यादि आभूषणों से गुरु अपने साधक का शृंगार करते हैं। ये गुण स्वतः ही एक साधक के आचरण में उतर जाते हैं, उसके लिए उसे कुछ अन्यथा प्रयास नहीं करना पड़ता है।
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केवल मन, वचन, कर्म से गुरु के चरणों में समर्पण करके निरंतर गुरु आज्ञा में चलते रहना है। साधक निरंतर ध्यान साधना करता है, तब गुरु उसके प्रारब्ध और संचित कर्मों पर कार्य करता है। गुरु साधक के पुरुषार्थ को आधार बनाकर उसके सभी संचित कर्मों को नष्ट कर देता है और उसके प्रारब्ध की पीड़ाओं को कम करने के लिए उसे सेवा कार्य में लगाता है। विनम्रता का गुण साधक के भीतर उसी क्षण प्रकट हो जाता है जब वह अपना अहंकार त्याग कर गुरु की शरण में आता है।
गुरु उनके व्यवहार में विपरीत परिस्थितियों के द्वारा धैर्य का गुण भरते हैं। मन व बुद्धि का त्याग करके गुरु आज्ञा में चलकर साधक संयम का गुण धारण करता है। गुरु के तपोबल की दिव्य तरंगों का स्पर्श प्राप्त करके साधक का संपूर्ण जीवन पवित्र एवं पावन हो जाता है। इस दौरान साध्वियों ने भजनों से गुरु महिमा का गुणगान किया।
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जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग हुआ। सत्संग में काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। इस दौरान आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी मयंका भारती ने प्रवचन किया। प्रवचन मेंं उन्होंने साधक के गुणों का बखान किया। उन्होंने कहा कि एक साधारण मनुष्य साधक की उपाधि तभी प्राप्त करता है, जब वह अहंकार रहित भाव से संत की शरणागति होकर ब्रह्म ज्ञान की दीक्षा प्राप्त कर लेता है।
उन्होंने बताया कि दीक्षा प्राप्त करना ही काफी नहीं है, बल्कि उस पर निरंतर गुरु आज्ञा में ध्यान साधना की गहराइयों में उस परमात्मा के प्रकाश स्वरूप से जुड़ता है। सहजता से ही अग्नि का संग करने से उष्णता प्राप्त होती है और जल का संग करने से शीतलता मिलती है। उसी प्रकार पूर्ण गुरु का संग करने से जो सद्गुण प्राप्त होते हैं। वे ही साधक के ऐसे गुण हैं जो हमारे जीवन को मूल्यवान और विलक्षण बनाते हैं।
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मिट्टी में शीतलता के गुण तभी आते हैं जब वह कुम्हार के हाथों में आकार लेकर अग्नि में तपाई जाती है। उसी तरह हमारे भीतर भी साधक के गुण गहन प्रक्रिया से प्रकट होते हैं। प्रेम, धैर्य, संयम, पवित्रता, सहिष्णुता और विनम्रता इत्यादि आभूषणों से गुरु अपने साधक का शृंगार करते हैं। ये गुण स्वतः ही एक साधक के आचरण में उतर जाते हैं, उसके लिए उसे कुछ अन्यथा प्रयास नहीं करना पड़ता है।
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केवल मन, वचन, कर्म से गुरु के चरणों में समर्पण करके निरंतर गुरु आज्ञा में चलते रहना है। साधक निरंतर ध्यान साधना करता है, तब गुरु उसके प्रारब्ध और संचित कर्मों पर कार्य करता है। गुरु साधक के पुरुषार्थ को आधार बनाकर उसके सभी संचित कर्मों को नष्ट कर देता है और उसके प्रारब्ध की पीड़ाओं को कम करने के लिए उसे सेवा कार्य में लगाता है। विनम्रता का गुण साधक के भीतर उसी क्षण प्रकट हो जाता है जब वह अपना अहंकार त्याग कर गुरु की शरण में आता है।
गुरु उनके व्यवहार में विपरीत परिस्थितियों के द्वारा धैर्य का गुण भरते हैं। मन व बुद्धि का त्याग करके गुरु आज्ञा में चलकर साधक संयम का गुण धारण करता है। गुरु के तपोबल की दिव्य तरंगों का स्पर्श प्राप्त करके साधक का संपूर्ण जीवन पवित्र एवं पावन हो जाता है। इस दौरान साध्वियों ने भजनों से गुरु महिमा का गुणगान किया।