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Yamuna Nagar News: कारगिल में शहीद पति की शहादत पर गर्व, सरकार से नाराजगी

Fri, 26 Jul 2024 05:12 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर Updated Fri, 26 Jul 2024 05:12 AM IST
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Proud of her husband's martyrdom in Kargil, angry with the government
अभय सिंह
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जगाधरी। देशभर में कारगिल युद्ध की 25वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। लोग भारतीय सेना व टाइगर हिल पर लहराते तिरंगे की फोटो पोस्ट कर गर्व महसूस कर रहे हैं। जिले में भी लोगों में इसके प्रति कुछ ऐसा ही उत्साह है। परंतु लोग यह नहीं जानते कि कारगिल युद्ध में अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद हवलदार नवीन कुमार मेहता का घर शहर के मॉडल टाउन में है। उनका परिवार इसी शहर में रहता और गुमनाम है।
कारगिल युद्ध को 25 साल हो गए हैं और विजय दिवस की रजत जयंती है। प्रशासन की ओर से इसके लिए कोई समारोह व सभा नहीं की जा रही है। वर्ष 1999 में शहीद हुए नवीन कुमार मेहता के बच्चे जवान हो गए हैं। वहीं प्रशासन व सरकार की ओर से उनकी सुध लेने की वीरांगनाओं की आस भी दम तोड़ चुकी है। कारगिल युद्ध में बलिदान देने वाले हवलदार नवीन कुमार मेहता की पत्नी डोली मेहता का दुख आंसू बनकर सामने आया। फिलहाल वह कनाडा में अपनी बेटी के घर हैं। मोबाइल पर हुई बात के दौरान उनके शब्दों में प्रशासन व सरकार के प्रति रोष दिखाई दिया।
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वीरांगना डोली मेहता ने बताया कि उन्हें पति की शहादत का हमेशा गर्व रहेगा। सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिक का परिवार किस हाल में है, इसकी प्रशासन व सरकार ने कभी सुध नहीं ली। प्रशासन की ओर से 15 अगस्त व 26 जनवरी को उन्हें याद किया जाता है। सम्मान के नाम पर उन्हें एक शॉल दी जाती है। उनके पति व अन्य सैनिकों की शहादत से देश विजय दिवस मनाता है।
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परंतु युद्ध में उनका संसार उजड़ गया। पति की शहादत के समय बच्चे छोटे थे। बेटी छह और बेटा तीन साल के थे। उन्हें अपने पिता का चेहरा भी याद नहीं है। केवल फोटो में उन्होंने पिता को देखा है। हर साल कारगिल दिवस पर उनका दर्द ताजा हो जाता है। पिता के शव से लिपटा तिरंगा देखकर बच्चों की आंखें नम हो जाती हैं।


मॉडल टाउन में 22 जुलाई 1964 में पैदा हुए नवीन कुमार ने फौजी पिता अमरनाथ मेहता से प्रेरित होकर देश सेवा की राह चुनी थी। मुकंद लाल स्कूल से 10वीं तक पढ़ाई कर मात्र 18 वर्ष की आयु में 1982 में वे सेना में हवलदार के पद पर भर्ती हुए। वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध में भाग लिया। 22 मई 1999 को दुश्मनों से लोहा लेते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। डोली मेहता ने पति की मृत्यु के समय बेटी छह वर्ष और बेटा राघव तीन वर्ष का था। बेटे को अपने पिता का चेहरा तक याद नहीं है। संवाद
तिरंगे पर आज भी लगा है लहू

कारगिल विजय दिवस पर शहीद मेहता के बेटे राघव से बात की, तो वे थोड़ा उदास हो गए। इस दौरान उन्होंने भी प्रशासन व सरकार की बेरुखी के प्रति अपनी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि प्रशासन को उनका परिवार केवल 15 अगस्त व 26 जनवरी को याद आता है। कारगिल विजय दिवस पर कभी कोई कार्यक्रम तक नहीं होता है। देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिक के सम्मान में प्रशासन के पास पुष्प की माला तक नहीं है। पास में ही यमुनानगर विधायक घनश्यास दास अरोड़ा का घर है। राघव ने कहा कि उनके पास पिता की आखिरी निशानी वह तिरंगा है, जिसमें उनका शव लिपट कर आया था। उस समय वह तीन साल के थे, तब वह कुछ समझ नहीं पाए, परंतु आज वह तिरंगा देखकर पिता को याद करते हैं। उस तिरंगे पर आज भी उनके पिता के वीरता व देशभक्ति के दास्तां लहू के रंग में लिखी हुई है।




खाए धक्के, नहीं मिली गैस एजेंसी : डोली

डोली मेहता ने बताया कि पति की शहादत पर सरकार ने 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी। इससे उन्होंने अपना घर बनाया और बच्चों को पढ़ाया। फिर बेटी की शादी कर दी। इसके बाद सरकार व प्रशासन ने उनकी कभी सुध नहीं ली। उन्होंने गैस एजेंसी व पेट्रोल पंप के लिए दर्जनों बार सरकार को अर्जी दी। हर बार मांग खारिज कर दी जाती। बेटा पढ़ लिखकर बेरोजगार था तो 2020 जनवरी में कारोबार शुरू किया था। कारोबार लॉकडाउन के कारण बंद हो गया। आमदनी के नाम पर उनके पास मात्र पति की पेंशन है। इसके बाद उन्होंने फिर कारोबार शुरू किया।
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