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भगवान शिव का अद्भुत श्रृंगार रहस्यात्मक : गौरी भारती
Sat, 30 Aug 2025 12:36 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Sat, 30 Aug 2025 12:36 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से शिव मंदिर पाबनी कलां में चल रही शिव कथा के तीसरे दिन साध्वी गौरी भारती ने भगवान शिव के अद्भुत शृंगार की विवेचना की। उन्होंने बताया कि भगवान शिव का यह अद्भुत शृंगार रहस्यात्मक है। उनके स्वरूप का एक-एक पक्ष शिक्षाप्रद है।
उन्होंने बताया कि भगवान शिव की बिखरी हुई जटाएं हमारे बिखरे मन का प्रतीक है। जिस प्रकार भगवान शिव ने जटाओं को समेट कर उनका मुकुट बनाया है, उसी प्रकार आवश्यक है कि हम अपने मन को संसार के विकारों से हटाकर प्रभु में लगाएं। मनुष्य के भीतर जो विकार हैं उसका कारण भी मन है। जब तक इंसान का मन विकसित नहीं हुआ तब तक वह किसी समाधान का अंग नहीं बन सकता। यदि समाज में परिवर्तन लाना है तो सबसे पहले व्यक्त्ति की चेतना और अंतर मन में परिवर्तन लाना होगा।
साध्वी ने बताया कि वृक्ष के प्राण जड़ है। जड़ को खत्म करने पर ही वृक्ष नष्ट हो सकता है। इसी तरह समाज में पनप रहे हर कुरीति, बुराई,हिंसा की जड़ मन है। इस मन रूपी जड़ को परिवर्तित करने पर ही समाज में परिवर्तन संभव है और यह परिवर्तन केवल ब्रह्म ज्ञान द्वारा ही आ सकता है। भगवान शिव के तन पर लगी भस्म मानव तन की नश्वरता को ओर संकेत है।गले में धारण किए सर्प काल का प्रतीक है।
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उन्होंने बताया कि भगवान शिव त्रिनेत्रधारी कहलाते हैं उनके स्वरूप का यह पक्ष प्राणिमात्र को एक गूढ़ आध्यात्मिक संदेश देता है। वह यह है कि हर मनुष्य त्रिनेत्रधारी है। हमारी भृकुटी के मध्य वह तीसरा नेत्र है जो बंद पड़ा है, परंतु पूर्ण संत मस्तक पर अपना वरद हस्त रखते हैं तो वह नेत्र खुल जाता है इंसान अपने भीतर शिव के ज्योति स्वरूप का साक्षात्कार करता है।
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यमुनानगर। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से शिव मंदिर पाबनी कलां में चल रही शिव कथा के तीसरे दिन साध्वी गौरी भारती ने भगवान शिव के अद्भुत शृंगार की विवेचना की। उन्होंने बताया कि भगवान शिव का यह अद्भुत शृंगार रहस्यात्मक है। उनके स्वरूप का एक-एक पक्ष शिक्षाप्रद है।
उन्होंने बताया कि भगवान शिव की बिखरी हुई जटाएं हमारे बिखरे मन का प्रतीक है। जिस प्रकार भगवान शिव ने जटाओं को समेट कर उनका मुकुट बनाया है, उसी प्रकार आवश्यक है कि हम अपने मन को संसार के विकारों से हटाकर प्रभु में लगाएं। मनुष्य के भीतर जो विकार हैं उसका कारण भी मन है। जब तक इंसान का मन विकसित नहीं हुआ तब तक वह किसी समाधान का अंग नहीं बन सकता। यदि समाज में परिवर्तन लाना है तो सबसे पहले व्यक्त्ति की चेतना और अंतर मन में परिवर्तन लाना होगा।
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साध्वी ने बताया कि वृक्ष के प्राण जड़ है। जड़ को खत्म करने पर ही वृक्ष नष्ट हो सकता है। इसी तरह समाज में पनप रहे हर कुरीति, बुराई,हिंसा की जड़ मन है। इस मन रूपी जड़ को परिवर्तित करने पर ही समाज में परिवर्तन संभव है और यह परिवर्तन केवल ब्रह्म ज्ञान द्वारा ही आ सकता है। भगवान शिव के तन पर लगी भस्म मानव तन की नश्वरता को ओर संकेत है।गले में धारण किए सर्प काल का प्रतीक है।
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उन्होंने बताया कि भगवान शिव त्रिनेत्रधारी कहलाते हैं उनके स्वरूप का यह पक्ष प्राणिमात्र को एक गूढ़ आध्यात्मिक संदेश देता है। वह यह है कि हर मनुष्य त्रिनेत्रधारी है। हमारी भृकुटी के मध्य वह तीसरा नेत्र है जो बंद पड़ा है, परंतु पूर्ण संत मस्तक पर अपना वरद हस्त रखते हैं तो वह नेत्र खुल जाता है इंसान अपने भीतर शिव के ज्योति स्वरूप का साक्षात्कार करता है।