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भगवान महावीर के अहिंसा के सिद्धांत को सभी ने स्वीकारा : डॉ. स्वाति
Mon, 12 Aug 2024 02:32 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 12 Aug 2024 02:32 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा माॅडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 23वें दिन प्रवचन करते हुए डॉ. स्वाति ने कहा कि भगवान महावीर ने अहिंसा का जो सिद्धांत विश्व को प्रदान किया था, उसे सभी स्वीकार किया है। उन्होंने पूज्य गुरुदेव के जीवन के विषय में विस्तार से जानकार दी।
उन्होंने बताया कि गुरुदेव का जन्म 12 अगस्त 1951 रिण्ढाना गांव में हुआ था। नौ वर्ष की खाने खेलने की छोटी सी उम्र में घर को त्याग कर गुरु चरणों में आ गए और 13 वर्ष की बाल्यावस्था में सब कुछ छोड़ कर जींद शहर में दीक्षा ग्रहण कर अपना जीवन गुरु चरणों में समर्पित कर दिया। आचार्य का व्यक्तित्व श्वेतांबर स्थानकवासी जैन परंपरा से जुड़ा होने पर भी दुनिया के कल्याण हेतु समर्पित है।
सभी धर्मों के आधार शास्त्रों का इन्हें गहरा ज्ञान है। इन्होंने जन कल्याण के लिए सौ से भी अधिक पुस्तकें लिखी हैं। इनकी मीठी और ज्ञान भरी वाणी सुनकर लाखों ने अपने जीवन को धर्म से जोड़ा है। भगवान महावीर ने अहिंसा का जो सिद्धांत प्रदान किया था, उसे विविध रूपों में आचार्य ने साकार किया है। जप, तप की कल्याणकारी साधना से आचार्य का जीवन एकाकार है।
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इनकी प्रेरणा पाकर अनेक साधकों ने निरंतर तप-साधनाएं सहजता के साथ संपन्न की हैं। उन्होंने कहा कि हमारा परम सौभाग्य है कि हमें ऐसे महान सद्गुरु की शरण प्राप्त हुई संसार में ऐसे महागुरु की शरण मिलना बहुत दुर्लभ है बहुत भाग्यशाली होते हैं वह लोग जिनके सिर पर गुरुओं की कृपा बनी रहती है हम प्रभु से यही प्रार्थना करते हैं कि पूज्य गुरुदेव हो स्वस्थ रहें उनकी कृपा दृष्टि सदैव हम पर बनी रहे।
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यमुनानगर। एसएस जैन सभा माॅडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 23वें दिन प्रवचन करते हुए डॉ. स्वाति ने कहा कि भगवान महावीर ने अहिंसा का जो सिद्धांत विश्व को प्रदान किया था, उसे सभी स्वीकार किया है। उन्होंने पूज्य गुरुदेव के जीवन के विषय में विस्तार से जानकार दी।
उन्होंने बताया कि गुरुदेव का जन्म 12 अगस्त 1951 रिण्ढाना गांव में हुआ था। नौ वर्ष की खाने खेलने की छोटी सी उम्र में घर को त्याग कर गुरु चरणों में आ गए और 13 वर्ष की बाल्यावस्था में सब कुछ छोड़ कर जींद शहर में दीक्षा ग्रहण कर अपना जीवन गुरु चरणों में समर्पित कर दिया। आचार्य का व्यक्तित्व श्वेतांबर स्थानकवासी जैन परंपरा से जुड़ा होने पर भी दुनिया के कल्याण हेतु समर्पित है।
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सभी धर्मों के आधार शास्त्रों का इन्हें गहरा ज्ञान है। इन्होंने जन कल्याण के लिए सौ से भी अधिक पुस्तकें लिखी हैं। इनकी मीठी और ज्ञान भरी वाणी सुनकर लाखों ने अपने जीवन को धर्म से जोड़ा है। भगवान महावीर ने अहिंसा का जो सिद्धांत प्रदान किया था, उसे विविध रूपों में आचार्य ने साकार किया है। जप, तप की कल्याणकारी साधना से आचार्य का जीवन एकाकार है।
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इनकी प्रेरणा पाकर अनेक साधकों ने निरंतर तप-साधनाएं सहजता के साथ संपन्न की हैं। उन्होंने कहा कि हमारा परम सौभाग्य है कि हमें ऐसे महान सद्गुरु की शरण प्राप्त हुई संसार में ऐसे महागुरु की शरण मिलना बहुत दुर्लभ है बहुत भाग्यशाली होते हैं वह लोग जिनके सिर पर गुरुओं की कृपा बनी रहती है हम प्रभु से यही प्रार्थना करते हैं कि पूज्य गुरुदेव हो स्वस्थ रहें उनकी कृपा दृष्टि सदैव हम पर बनी रहे।