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किसानों के हित में धान की सीधी बिजाई : डॉ. रावल
Fri, 28 Jun 2024 05:15 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Fri, 28 Jun 2024 05:15 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
रादौर। कृषि विज्ञान केंद्र दामला में धान उत्पादन तकनीक पर प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ। कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वय डॉ. संदीप रावल ने कृषि अधिकारियों से आह्वान किया कि किसानों के बीच बेहतरीन कृषि तकनीकों को समय रहते प्रचारित-प्रसारित करें। डॉ. संदीप रावल ने कहा कि धान की सीधी बिजाई पद्धति भी किसानों के हित में होने के साथ जल-संरक्षण में भी सहायक है।
धान की नर्सरी तैयार करने का समय बच जाता है। नर्सरी में आने वाले खर्च भी बच जाते हैं और रोपाई की लागत भी नहीं लगती है। ट्रैक्टर व मशीनरी की टूट फूट व डीजल की भी बचत हो पाती है। सबसे मुख्य बात वर्षा ऋतु में बारिश का पानी खेत में रिसाव कर भूजल स्तर को बरकरार रखती है। जिससे भूजल-संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
धान की पारंपरिक प्रणाली में खेत में पानी का रिसाव नहीं हो पाता, क्योंकि जब खेत में कद्दू क्रिया की जाती है तो सबसे पहले मिट्टी के भारी कण जमते हैं। उसके बाद उससे कम भारी, सबसे बाद में सबसे हल्के मृदा के कण जमते हैं। जिससे एक कठोर परत का निर्माण हो जाता है। इसी कारण से खेत में पानी भरा रह जाता है।
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जब बरसात का समय आता है तो पानी भूमि में रिसाव नहीं कर पाता और नालों व नहरों के माध्यम से अन्य निचले स्थानों या समुद्र में जा गिरता है। जिसे भूजल संरक्षण संभव नहीं हो सकता। इन्हीं सब को ध्यान में रख धान की सीधी बिजाई प्रणाली का महत्व है। धान की सीधी बिजाई में सबसे बड़ी समस्या खरपतवार प्रबंधन की पाई गई है। इसके प्रबंधन के लिए बड़ी ही सजगता व धैर्य से काम लेने की जरूरत होती है।
बुवाई से पहले खेत में पानी लगाकर खरपतवार का जमाव होने दें। उसके बाद खेत में ही मिला दें या नोन-सिलेक्टिव हरबसाइड का छिड़काव कर बीज बनने से पहले खत्म कर दें। पौधा संरक्षण अधिकारी डॉ. सतीश कुमार ने धान में कीड़े व बीमारी की पहचान करने और समय रहते उचित प्रबंध करने की सलाह दी। इस मौके पर मुख्य सलाहकार डॉ. एनके गोयल, प्रशिक्षण सहायक डॉ. कर्ण सिंह सैनी, एसएमएस डॉ. हरीश पांडे, डॉ. अमन व करीब 80 कृषि अधिकारी उपस्थित रहे।
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रादौर। कृषि विज्ञान केंद्र दामला में धान उत्पादन तकनीक पर प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ। कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वय डॉ. संदीप रावल ने कृषि अधिकारियों से आह्वान किया कि किसानों के बीच बेहतरीन कृषि तकनीकों को समय रहते प्रचारित-प्रसारित करें। डॉ. संदीप रावल ने कहा कि धान की सीधी बिजाई पद्धति भी किसानों के हित में होने के साथ जल-संरक्षण में भी सहायक है।
धान की नर्सरी तैयार करने का समय बच जाता है। नर्सरी में आने वाले खर्च भी बच जाते हैं और रोपाई की लागत भी नहीं लगती है। ट्रैक्टर व मशीनरी की टूट फूट व डीजल की भी बचत हो पाती है। सबसे मुख्य बात वर्षा ऋतु में बारिश का पानी खेत में रिसाव कर भूजल स्तर को बरकरार रखती है। जिससे भूजल-संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
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धान की पारंपरिक प्रणाली में खेत में पानी का रिसाव नहीं हो पाता, क्योंकि जब खेत में कद्दू क्रिया की जाती है तो सबसे पहले मिट्टी के भारी कण जमते हैं। उसके बाद उससे कम भारी, सबसे बाद में सबसे हल्के मृदा के कण जमते हैं। जिससे एक कठोर परत का निर्माण हो जाता है। इसी कारण से खेत में पानी भरा रह जाता है।
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जब बरसात का समय आता है तो पानी भूमि में रिसाव नहीं कर पाता और नालों व नहरों के माध्यम से अन्य निचले स्थानों या समुद्र में जा गिरता है। जिसे भूजल संरक्षण संभव नहीं हो सकता। इन्हीं सब को ध्यान में रख धान की सीधी बिजाई प्रणाली का महत्व है। धान की सीधी बिजाई में सबसे बड़ी समस्या खरपतवार प्रबंधन की पाई गई है। इसके प्रबंधन के लिए बड़ी ही सजगता व धैर्य से काम लेने की जरूरत होती है।
बुवाई से पहले खेत में पानी लगाकर खरपतवार का जमाव होने दें। उसके बाद खेत में ही मिला दें या नोन-सिलेक्टिव हरबसाइड का छिड़काव कर बीज बनने से पहले खत्म कर दें। पौधा संरक्षण अधिकारी डॉ. सतीश कुमार ने धान में कीड़े व बीमारी की पहचान करने और समय रहते उचित प्रबंध करने की सलाह दी। इस मौके पर मुख्य सलाहकार डॉ. एनके गोयल, प्रशिक्षण सहायक डॉ. कर्ण सिंह सैनी, एसएमएस डॉ. हरीश पांडे, डॉ. अमन व करीब 80 कृषि अधिकारी उपस्थित रहे।