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खैर की तस्करी का जाल
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खैर की तस्करी: यमुनानगर से दिल्ली होते हुए नेपाल तक फैला है जाल
यमुनानगर के जंगल खैर तस्करों के निशाने पर, पिछले तीन साल में कट चुकी हैं करोड़ों की लकड़ियां
तस्करी पर वन विभाग और पुलिस के अधिकारी नहीं लगा पा रहे अंकुश
यमुनानगर/छछरौली
जिले की वन संपदा खतरे में है। एक तरफ अवैध खनन की वजह से जंगल कम हो रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ वन माफिया धड़ल्ले से बेशकीमती खैर के पेड़ काट रहे हैं। आलम ये है कि खैर के सैकड़ों साल पुराने पेड़ काटने के लगातार मामले सामने आ रहे हैं। वन माफिया द्वारा प्लानिंग के साथ घने जंगल के अंदर जाकर पेड़ काट लिए जाते हैं। जानकारों का कहना है कि पिछले तीन साल के दौरान 10 से 20 करोड़ रुपये की खैर की लकड़ी चोरी हो चुकी है। अगर यही हाल रहा तो कुछ ही समय में यमुनानगर के जंगल खैरमुक्त हो जाएंगे। जबकि वन विभाग और पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने तक की कागजी कार्रवाई तक सीमित हैं और दुर्लभ खैर के पेड़ों को बचाने के लिए कोई प्लानिंग नहीं है।
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जब रक्षक ही बन जाएं भक्षक
पिछले साल खैर तस्करी के करीब 30 मामले सीआईए के पास जांच के लिए आए। इन मामलों की जब गहनता से जांच की गई तो परिणाम चौंकाने वाले थे। क्योंकि सीआईए को वनरक्षक से लेकर रेंज अधिकारी तक की भूमिका संदिग्ध मिली थी। पुलिस ने एक वनरक्षक, एक वन दरोगा व एक रेंज अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार भी किया था। हालांकि ये अधिकारी और कर्मचारी जमानत पर अभी बाहर हैं। लोगों का कहना है कि वन विभाग के कर्मचारी व अधिकारियों की मिलीभगत के बिना जंगल से पेड़ काटना तो बहुत दूर एक टहनी तक नहीं काटी जा सकती।
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कटाई से लेकर ट्रांसपोर्टेशन तक सुनियोजित
खैर तस्कर वैध रूप से किसानों के खेतों में खड़े पेड़ों की कटाई का परमिट लेने वाले ठेकेदारों के सम्पर्क में रहते हैं। जंगलों से चोरी की गई लकड़ी को इन ठेकेदारों के लाइसेंस पर फैक्ट्रियों में भेजे जाने का काम किया जाता है। यहां भी मिलीभगत सामने आती है। क्योंकि परमिट लिया जाता है 10 पेड़ों का और ट्रांसपोर्ट किया जाता है 100 पेड़ों का। परमिट वाले पेड़ों के टुकड़ों तक की गिनती करने का प्रावधान है, लेकिन वन विभाग के अधिकारी आंख बंद किए रहते हैं। ऐसे में तस्कर और ठेकेदार करोड़ों रुपये कमा जाते हैं।
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दिल्ली और नेपाल तक जुड़े हैं तार
पंजाब के राजपुरा और दिल्ली की आजाद नगर मंडी खैर की लकड़ी का बहुत बड़ा बाजार है। जहां पर खैर की लकड़ी की कीमत 8 हजार से 10 हजार प्रति क्विंटल के हिसाब से बेची जाती है। खैर की बेशकीमती लकड़ी से खाने वाला कत्था बनाया जाता है। फैक्ट्री प्रोसेस में खैर की लकड़ी से पहले खैर की लकडी का तेल निकाला जाता है और उसके बाद लकड़ी का कत्था बनाया जाता है। खैर का तेल बहुत महंगे दामों पर बिकता है। हाल ही में नेपाल के तस्करों से भी स्थानीय तस्करों के तार जुड़े होने का खुलासा हुआ था।
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पांच लाख तक होती है एक पेड़ की कीमत
जिले के जंगलों में खैर के सैकड़ों साल पुराने पेड़ हैं। एक पेड़ पर आठ से दस क्विंटल से लेकर चार-पांच टन तक की लकड़ी निकल जाती है। कम से कम पांच से सात हजार रुपये प्रति क्विंटल का रेट है। ऐसे में एक पेड़ की कीमत पांच लाख रुपये तक मिल जाती है। वन विभाग के मुताबिक बेशकीमती पेड़ कुछ ही मिनटों में काट कर झाड़ियों में छिपा दिए जाते हैं। कटे हुए पेड़ों को पगडंडियों तक लाने और वहां तस्करों की गाड़ी में लादने के लिए बाकायदा जाल बुना जाता है। जंगल के किनारे ही तस्करों ने गुप्त गोदाम तक बना रखे हैं।
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बड़ा रैकेट, लेकिन छोटे मोहरे पकड़े जाते हैं
पेड़ काटने से लेकर उसे अंतिम ठिकाने तक पहुंचाने में कई टीम काम करती हैं। पेड़ काटने वाले अलग, उन्हें गाड़ी तक पहुंचाने वाले अलग, जंगल तक गाड़ी लाने वाले अलग और गाड़ी को ठिकाने तक पहुंचाने वाले अलग। अक्सर एक टीम दूसरे को नहीं पहचानती। यानी लूट इतने शातिराना अंदाज में होती है कि बड़े खिलाड़ी बच निकलते हैं। छोटे मोहरे ही पकड़े जाते हैं। पुलिस और वन विभाग मजदूरों या ड्राइवरों को पकड़कर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं।
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वाहन भी फाइनेंस के
तस्कर इतने चालाक हैं कि इस लूट में वो चोरी या फाइनेंस के एसयूवी, ट्रक और एंबुलेंस इस्तेमाल करते हैं। 40-50 हजार में खरीदी गईं ये गाड़ियां पकड़ी भी गईं तो तस्कर इन्हें छुड़वाने की कोशिश नहीं करते। नतीजतन, वन विभाग के दफ्तर में गाड़ी और लकड़ी का ढेर इकट्ठा होता जाता है।
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कुल्हाड़ी की बजाय आरी का प्रयोग
तस्कर कुल्हाड़ी से पेड़ों की कटाई किया करते थे, लेकिन रात को इलाका सुनसान होता है। इसलिए एक कुल्हाड़ी लगते ही पूरे इलाके में आवाज गूंजती है। इसलिए तस्कर अब आरी के द्वारा पेड़ों को आसानी से काट देते हैं। इससे आवाज भी नहीं आती और कटाई भी जल्दी हो जाती है।
वर्जन
मैंने कुछ महीने पहले ही ज्वाइन किया है। खैर तस्करों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है। एक महीने के भीतर दो बार अवैध रूप से काटी गई लकड़ियां बरामद की जा चुकी है। यह अभियान जारी रहेगा। वन विभाग की टीमें इस समय दिन रात तस्करों पर नकेल कसने का कार्य कर रही हैं।
-सूरजभान, जिला वन अधिकारी
फोटो नंबर 12
यमुनानगर के जंगल खैर तस्करों के निशाने पर, पिछले तीन साल में कट चुकी हैं करोड़ों की लकड़ियां
तस्करी पर वन विभाग और पुलिस के अधिकारी नहीं लगा पा रहे अंकुश
यमुनानगर/छछरौली
जिले की वन संपदा खतरे में है। एक तरफ अवैध खनन की वजह से जंगल कम हो रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ वन माफिया धड़ल्ले से बेशकीमती खैर के पेड़ काट रहे हैं। आलम ये है कि खैर के सैकड़ों साल पुराने पेड़ काटने के लगातार मामले सामने आ रहे हैं। वन माफिया द्वारा प्लानिंग के साथ घने जंगल के अंदर जाकर पेड़ काट लिए जाते हैं। जानकारों का कहना है कि पिछले तीन साल के दौरान 10 से 20 करोड़ रुपये की खैर की लकड़ी चोरी हो चुकी है। अगर यही हाल रहा तो कुछ ही समय में यमुनानगर के जंगल खैरमुक्त हो जाएंगे। जबकि वन विभाग और पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने तक की कागजी कार्रवाई तक सीमित हैं और दुर्लभ खैर के पेड़ों को बचाने के लिए कोई प्लानिंग नहीं है।
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जब रक्षक ही बन जाएं भक्षक
पिछले साल खैर तस्करी के करीब 30 मामले सीआईए के पास जांच के लिए आए। इन मामलों की जब गहनता से जांच की गई तो परिणाम चौंकाने वाले थे। क्योंकि सीआईए को वनरक्षक से लेकर रेंज अधिकारी तक की भूमिका संदिग्ध मिली थी। पुलिस ने एक वनरक्षक, एक वन दरोगा व एक रेंज अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार भी किया था। हालांकि ये अधिकारी और कर्मचारी जमानत पर अभी बाहर हैं। लोगों का कहना है कि वन विभाग के कर्मचारी व अधिकारियों की मिलीभगत के बिना जंगल से पेड़ काटना तो बहुत दूर एक टहनी तक नहीं काटी जा सकती।
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कटाई से लेकर ट्रांसपोर्टेशन तक सुनियोजित
खैर तस्कर वैध रूप से किसानों के खेतों में खड़े पेड़ों की कटाई का परमिट लेने वाले ठेकेदारों के सम्पर्क में रहते हैं। जंगलों से चोरी की गई लकड़ी को इन ठेकेदारों के लाइसेंस पर फैक्ट्रियों में भेजे जाने का काम किया जाता है। यहां भी मिलीभगत सामने आती है। क्योंकि परमिट लिया जाता है 10 पेड़ों का और ट्रांसपोर्ट किया जाता है 100 पेड़ों का। परमिट वाले पेड़ों के टुकड़ों तक की गिनती करने का प्रावधान है, लेकिन वन विभाग के अधिकारी आंख बंद किए रहते हैं। ऐसे में तस्कर और ठेकेदार करोड़ों रुपये कमा जाते हैं।
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दिल्ली और नेपाल तक जुड़े हैं तार
पंजाब के राजपुरा और दिल्ली की आजाद नगर मंडी खैर की लकड़ी का बहुत बड़ा बाजार है। जहां पर खैर की लकड़ी की कीमत 8 हजार से 10 हजार प्रति क्विंटल के हिसाब से बेची जाती है। खैर की बेशकीमती लकड़ी से खाने वाला कत्था बनाया जाता है। फैक्ट्री प्रोसेस में खैर की लकड़ी से पहले खैर की लकडी का तेल निकाला जाता है और उसके बाद लकड़ी का कत्था बनाया जाता है। खैर का तेल बहुत महंगे दामों पर बिकता है। हाल ही में नेपाल के तस्करों से भी स्थानीय तस्करों के तार जुड़े होने का खुलासा हुआ था।
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पांच लाख तक होती है एक पेड़ की कीमत
जिले के जंगलों में खैर के सैकड़ों साल पुराने पेड़ हैं। एक पेड़ पर आठ से दस क्विंटल से लेकर चार-पांच टन तक की लकड़ी निकल जाती है। कम से कम पांच से सात हजार रुपये प्रति क्विंटल का रेट है। ऐसे में एक पेड़ की कीमत पांच लाख रुपये तक मिल जाती है। वन विभाग के मुताबिक बेशकीमती पेड़ कुछ ही मिनटों में काट कर झाड़ियों में छिपा दिए जाते हैं। कटे हुए पेड़ों को पगडंडियों तक लाने और वहां तस्करों की गाड़ी में लादने के लिए बाकायदा जाल बुना जाता है। जंगल के किनारे ही तस्करों ने गुप्त गोदाम तक बना रखे हैं।
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बड़ा रैकेट, लेकिन छोटे मोहरे पकड़े जाते हैं
पेड़ काटने से लेकर उसे अंतिम ठिकाने तक पहुंचाने में कई टीम काम करती हैं। पेड़ काटने वाले अलग, उन्हें गाड़ी तक पहुंचाने वाले अलग, जंगल तक गाड़ी लाने वाले अलग और गाड़ी को ठिकाने तक पहुंचाने वाले अलग। अक्सर एक टीम दूसरे को नहीं पहचानती। यानी लूट इतने शातिराना अंदाज में होती है कि बड़े खिलाड़ी बच निकलते हैं। छोटे मोहरे ही पकड़े जाते हैं। पुलिस और वन विभाग मजदूरों या ड्राइवरों को पकड़कर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं।
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वाहन भी फाइनेंस के
तस्कर इतने चालाक हैं कि इस लूट में वो चोरी या फाइनेंस के एसयूवी, ट्रक और एंबुलेंस इस्तेमाल करते हैं। 40-50 हजार में खरीदी गईं ये गाड़ियां पकड़ी भी गईं तो तस्कर इन्हें छुड़वाने की कोशिश नहीं करते। नतीजतन, वन विभाग के दफ्तर में गाड़ी और लकड़ी का ढेर इकट्ठा होता जाता है।
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कुल्हाड़ी की बजाय आरी का प्रयोग
तस्कर कुल्हाड़ी से पेड़ों की कटाई किया करते थे, लेकिन रात को इलाका सुनसान होता है। इसलिए एक कुल्हाड़ी लगते ही पूरे इलाके में आवाज गूंजती है। इसलिए तस्कर अब आरी के द्वारा पेड़ों को आसानी से काट देते हैं। इससे आवाज भी नहीं आती और कटाई भी जल्दी हो जाती है।
वर्जन
मैंने कुछ महीने पहले ही ज्वाइन किया है। खैर तस्करों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है। एक महीने के भीतर दो बार अवैध रूप से काटी गई लकड़ियां बरामद की जा चुकी है। यह अभियान जारी रहेगा। वन विभाग की टीमें इस समय दिन रात तस्करों पर नकेल कसने का कार्य कर रही हैं।
-सूरजभान, जिला वन अधिकारी
फोटो नंबर 12