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उम्र 100 के पार पर याद है अंग्रेजों के जुल्मों की दास्तान

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 13 Aug 2022 02:21 AM IST
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At the age of 100, remember the story of British atrocities
पंकज बत्रा
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बिलासपुर। उम्र 100 वर्ष के पार हो चुकी है, लेकिन आज भी अंग्रेजों के जुल्मों सितम की हर दास्तां याद है। यही नहीं आजादी के बाद बंटवारे में हुए खूनी संघर्ष के भी वो चश्मदीद रहे हैं। बात हो रही शाहपुर 302 निवासी सरदार कंवर सिंह की। उन्होंने बताया कि जब अंग्रेज सैनिक बाजार से निकलते थे तो ग्राहक और दुकानदार सहम जाते थे। लोगों को भय था कि कब किसे बंदी बना लिया जाए, कुछ पता नहीं। विरोध करने पर अंग्रेज सैनिकों की ओर से यातनाएं दी जाती थीं।
शाहपुर 302 निवासी सरदार कंवर सिंह का कहना है कि देश के बंटवारे के समय हिंदू-मुस्लिम के मध्य में हुए खूनी संघर्ष के समय उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाले दो मुस्लिम परिवारों की जान बचाई थी। इसके पश्चात वह परिवार जान बचाकर गांव से निकल गया था। बातचीत में उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले व्यक्तियों को अंग्रेज न दिन देखते थे न रात। आधी रात को भी अंग्रेज सैनिक घरों से निकाल कर मारना व पीटना शुरू कर देते थे। उन्हें जेलों में भूखा प्यासा रखा जाता था। इसके बावजूद आजादी के दीवानों का उत्साह देखते ही बनता था। खास तौर से बच्चों व युवाओं में भारी उत्साह व जोश रहता था।
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कंवर सिंह के पुत्र सरदार अमरीक सिंह ने बताया कि वह पांच साल के रहे होंगे जब वह अपने पिता कंवर सिंह सहित पूरे परिवार के साथ लुधियाना के किला रायपुर से आकर शाहपुर 302 में बस गए थे।
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बेटे और पौत्र को भी सुनाते रहे हैं आजादी के किस्से
कंवर सिंह के पौत्र सर्बजीत सिंह ने बताया कि उनके दादा बचपन से ही उन्हें आजादी से पूर्व के किस्से बताते आ रहे हैं। देश की आजादी के लिए बलिदान देने वाले शहीदों के प्रति सम्मान देने के लिए उन्हें प्रेरित करते हैं। देशप्रेम की भावना हमेशा बच्चों में रहे, इसके लिए अपने इकलौते पुत्र सरदार अमरीक सिंह व पौत्र इन्द्रपाल सिंह को आर्मी में भर्ती करवा देश सेवा के लिए समर्पित किया है।
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