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शहर में लगेंगे 4जी के 200 टावर
अमर उजाला फरीदाबाद
Updated Tue, 26 Nov 2013 11:27 PM IST
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रिलायंस ने नए साल से 4जी सर्विस देने के लिए शहर में 200 टावरों की जगह के लिए आवेदन किया है। नगर निगम प्रशासन ने इनमें से 89 साइट उपलब्ध करा दी हैं। शेष साइट मिल नहीं रही हैं, इसलिए अब कंपनी निजी बिल्डिंगों या प्लॉट पर टावर लगाने का विकल्प अपना सकती है।
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इतनी बड़ी संख्या में मोबाइल टावर बढ़ने से शहर में रेडिशन का खतरा भी बढ़ेगा, लेकिन हालत यह है कि अब तक रेडियेशन की जांच का कोई इंतजाम तक नहीं है। निजी प्रॉपर्टी पर टावर लगाने से पहले पड़ोसियों से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) लेना पड़ेगा, ताकि टावर लगने के बाद कोई भी पक्ष विवाद न करे। आमतौर पर टावर से सबसे ज्यादा समस्या पड़ोसी को ही होती है। नगर निगम के डिप्टी टाउन प्लानर रवि सिंगला का कहना है कि और जगह मिलेगी, तभी दी जाएगी। जितनी साइटें दी गई हैं, वे सब नगर निगम की हैं। इस समय निगम क्षेत्र में विभिन्न मोबाइल ऑपरेटरों के 478 टावर हैं।
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फरवरी 2014 तक शहर के 208 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 678 टावर हो जाएंगे। रेडिएशन को लेकर नगर निगम की ओर से इन कंपनियों पर कोई अंकुश नहीं है। नगर निगम सिर्फ इन टावरों से आने वाली स्ट्रक्चरल परेशानी को दूर करने का काम करता है। जोनल एंड टैक्सेशन आफीसर बीएस पंवार का कहना है कि निगम के पास ऐसा कोई इंस्ट्रूमेंट नहीं है, जिससे रेडिएशन की जांच हो सके।
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जिस निजी या सरकारी प्रॉपर्टी पर टावर लगेगा, उसके स्ट्रक्चरल स्ट्रेंथ का सर्टिफिकेट जमा करना होगा। यह सर्टिफिकेट आईआईटी दिल्ली और आईआईटी रुड़की, नेशनल काउंसिल फॉर बिल्डिंग मैटीरियल बल्लभगढ़, सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट रुड़की, रेल इंडिया टेक्निकल एंड इकॉनॉमिक सर्विसेस लिमिटेड का मान्य है।
उधर, इस संबंध में फिजिशियन डॉ. सुरेंद्र दत्ता का कहना है कि टावरों के स्ट्रक्चरल खतरों पर नजर रखने के साथ-साथ नगर निगम और हुडा अधिकारियों के पास रेडिएशन रीडिंग मीटर होना चाहिए, जिससे रेडियो मैगनेटिक वेव्स मापी जा सकें। तभी पता चलेगा कि कौन सा टावर खतरनाक है। क्योंकि इसकी तरंगों से कई प्रकार के कैंसर पनपने और सुनने की क्षमता कम होने की आशंका है। उनके मुताबिक, रेडियेशन का ही प्रभाव है कि शहरी क्षेत्र में गौरैया और अन्य पक्षी लगभग गायब हो गए हैं।
लोग करते रहे हैं विरोध
- जून 2009 में नंगला रोड स्थित सुंदर कालोनी में अवैध रूप से टावर निर्माण व रेडिएशन के खतरों को लेकर निगम मुख्यालय में प्रदर्शन हुआ था।
- अगस्त 2009 में एनएच-दो-के ब्लाक निवासियों ने समाजसेवी आश्विनी आजाद के नेतृत्व में टावरों के खिलाफ नगर निगम को शिकायत दी थी। जिसमें लोगों ने आरोप लगाया था कि टावर लगाने से पहले कंपनी ने आसपड़ोस के लोगों से कोई राय नहीं ली जाती। लोगों ने यह भी आरोप लगाए थे कि टावर लगने के तीन साल के भीतर आसपास के पांच व्यक्तियों की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई।
- इसके अलावा संजय कालोनी, नंगला एंक्लेव, पांच नंबर, सेक्टर-21 आदि में कई लोगों का अपने पड़ोसियों के साथ इस मामले को लेकर नगर निगम में शिकायत की।
सरकार ऑपरेटरों पर मेहरबान
राज्य सरकार ने फीस में अप्रत्याशित कटौती कर मोबाइल टावर लगाना और आसान कर दिया है। टावरों के लिए जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक, मोबाइल टावर लगाने वाली कंपनी को दो लाख रुपये की बजाय सिर्फ 75 हजार रुपये इंस्टालेशन चार्ज देना होगा। नगर निगम प्रशासन इन टावर संचालकों से सालाना रिनुअल फीस भी नहीं वसूलेगा। पहले हर टावर से 10 फीसदी रिनुअल चार्ज लिया जाता था। अब सिर्फ सालाना किराया लगेगा। वह भी जिस जगह टावर लगेगा, वहां के कलेक्टर रेट का 6 फीसदी। पार्षद योगेश ढींगड़ा का कहना है कि निजी प्रॉपर्टी पर टावर लगाने के लिए शर्तें अच्छी हैं, लेकिन फीस में रियायत की जगह वृद्धि करनी चाहिए थी। निगम सदन ने तो इंस्टालेशन फीस दो लाख की जगह पांच लाख रुपये करने की मांग की थी।