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युवा नजरिया: राम मंदिर आस्था का प्रतीक, राजनीति से एकता कमजोर होगी...
Thu, 18 Jan 2024 12:05 AM IST
भूपेंद्र सिंह
अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा)
अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा)
Published by: भूपेंद्र सिंह
Updated Thu, 18 Jan 2024 12:05 AM IST
सार
श्रीराम मंदिर अटूट आस्था का प्रतीक है। आस्था भी ऐसी कि श्रद्धालु इसे कई सदियों तक याद रखेंगे। मंदिर को लेकर समय-समय पर राजनीति भी होती रही है। राजनीतिक घेराबंदी के बाद भी आस्था को समर्पित यह दिन करोड़ों देशवासियों की भावना से जुड़ा है। देश में जब भी धर्म के नाम पर राजनीति हुई है, तब-तब राष्ट्रीय एकता कमजोर हुई है। विकास के मुद्दे गायब हुए हैं। भारत में धर्म के नाम पर राजनीति करना चिंता का विषय है।
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पूजा सैनी।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
पूजा सैनी निवासी, तहसील रोड, कलानौर के अनुसार अयोध्या में श्रीराम मंदिरनिर्माण अटूट आस्था का प्रतीक है। एक ऐसी आस्था, जिसे श्रद्धालु सदियों तक याद रखेंगे। जब मंदिर नहीं बना था तब भी यह लोगों की आस्था का केंद्र था। श्रीराम मंदिर को लेकर समय-समय पर राजनीति भी होती रही है।
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बीजेपी अपने घोषणापत्र में श्रीराम मंदिर निर्माण को मुद्दा बनाती रही है। अब जब मंदिर बन रहा है तो इंडिया अलायंस के नेता न्यौता मिलने के बाद भी कार्यक्रम में शामिल होने पर फैसला नहीं ले पा रहे हैं। यह आयोजन 22 जनवरी को अयोध्या में होने वाला है।
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केवल आस्था से जुड़ा होता तो इसमें भाग लेने वाले शायद धार्मिक नेता होते, जबकि ऐसा दिख रहा है, इस कार्यक्रम में धार्मिक गुरुओं से ज्यादा राजनीतिक नेता शामिल होने जा रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसकी रौनक बनते जा रहे हैं। उनके अलावा बीजेपी और आरएसएस के बड़े नेता भी मंच पर नजर आएंगे।
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हालांकि, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने मंदिर उद्घाटन के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया है। 'नर्म' हिंदुत्व का आकर्षण जिस तरह से धर्मनिरपेक्ष पार्टियों में दिख रहा है। इसमें कम्युनिस्ट पार्टी का धर्मनिरपेक्षता की बात करना बड़ी हिम्मत की बात है।
भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में धर्म का राजनीतिक उपयोग बहुत ही खतरनाक है। यह सब देखकर बहुत दुख होता है। क्या इसी भारत का सपना बाबा साहेब आंबेडकर ने देखा था? क्या इसी भारत के लिए भगतसिंह ने कुर्बानी दी थी? आज इस ऐतिहासिक तथ्य को भुलाया जा रहा है कि जब भी इस देश में धर्म के नाम पर राजनीति हुई है, तब-तब राष्ट्रीय एकता कमजोर हुई है।
ऐसा लगता है कि हमारे राजनेता यह भूल गए हैं कि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता पर टिका है। धर्मनिरपेक्षता तो संविधान का मूलभूत ढांचा है। देश के अलग-अलग हिस्सों से खबरें आ रही हैं कि राम के नाम पर बड़ी-बड़ी रैलियां हो रही हैं, जिसमें कई बार अल्पसंख्यक विरोधी नारे लगाए जा रहे हैं। इन रैलियों में उपद्रवी लोग मामले को हिंदू-मुस्लिम विवाद में बदलने की पूरी तैयारी में हैं।
प्रशासन इन सबको सियासी फायदे के लिए नजरअंदाज कर रहा है, जो देश हित में नहीं है। हिंदुत्व समर्थक यह सोचते हैं कि श्रीराम मंदिर आस्था का विषय है, लेकिन वह इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि अगर आस्था है, तो राम मंदिर का उद्घाटन आम चुनाव से ठीक पहले क्यों हो रहा है? काश, यह मामला आस्था का होता तो इसे धर्मगुरु पर छोड़ दिया जाता और सरकार आम लोगों की भलाई के लिए काम करती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। यह चिंता का विषय है कि जहां अन्य देश समानता के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं भारत के राजनेता मंदिर-मस्जिद की आग भड़काकर राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं, लेकिन इस नाजुक समय में हमें धैर्य रखना होगा और लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीकों से अपनी बात और अपने आंदोलन को खड़ा करना है।
विशेषज्ञ की राय
चयनित लेख में इतिहास के तथ्यों को समेटने का प्रयास किया गया है। भाषा का स्तर ठीक है। लेखन में प्रवाह होने के कारण इसे चुना गया है।
पूजा सैनी का लेख अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन समारोह पर विश्लेषणात्मक दृष्टि प्रदान करता है। राम मंदिर निर्माण, अटूट आस्था का प्रतीक है। आखिरकार पूरा हो रहा है। राजनीतिक घेराबंदी के बावजूद, यह समारोह आस्था के प्रति समर्पित होने का प्रयास कर रहा है। आने वाले कार्यक्रम में धार्मिक गुरुओं की अधिकता के बजाय राजनीतिक नेताओं की भारी मौजूदगी, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की, ने इस समारोह को राजनीतिक रूप में उच्च स्तर पर स्थापित किया है। आंबेडकर और भगतसिंह ने जिस धर्मनिरपेक्ष भारत का सपना देखा था, उसी भारत में धर्म के नाम पर राजनीति करना चिंता का विषय है। जब भी इस देश में धर्म के नाम पर राजनीति हुई है, तब-तब राष्ट्रीय एकता कमजोर हुई है और विकास के मुद्दे गायब हुए हैं। आर्टिकल इस पर भी प्रकाश डालता है कि किस प्रकार राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ साधने के लिए धर्म का सहारा लेती है और कामयाब होती हैं। इस आर्टिकल से हमें यह सीखने को मिलता है कि धर्म के नाम पर हुई राजनीति ने हमारी राष्ट्रीय एकता को कमजोर किया है और देश की बेहतरी के लिए धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए। राम मंदिर का विवाद एक धार्मिक दृष्टिकोण का मसला था, भविष्य में इस प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो इसके लिए सांप्रदायिक समस्या का हल ढूंढ़ना होगा और धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल बंद करना होगा। -प्रो. राजेंद्र शर्मा, अध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, एमडीयू।
यह भी जानें
अयोध्या के राम मंदिर का मूल डिजाइन 1988 में अहमदाबाद के चंद्रकांत सोमपुरा ने तैयार किया था। मूल से कुछ बदलावों के साथ नया डिजाइन 2020 में सोमपुरा ने तैयार किया था। हिंदू ग्रंथों, वास्तु शास्त्र और शिल्प शास्त्रों के अनुसार राम मंदिर 250 फीट चौड़ा, 380 फीट लंबा और 161 फीट ऊंचा होगा। एक बार पूरा होने पर, यह परिसर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा हिंदू मंदिर होगा। मंदिर परंपरागत नागर शैली में बनाया गया है। यह तीन मंजिला होगा, प्रत्येक मंजिल की ऊंचाई 20 फीट, इसमें कुल 392 खंभे और 44 दरवाजे बनाए गए हैं। राम मंदिर के लिए तीन मूर्तिकारों ने रामलला की मूर्ति बनाई थी। इनमें से कर्नाटक के मूर्तिकार अरुण योगीराज की बनाई मूर्ति का मंदिर के गर्भ गृह के लिए चयन हुआ है। यह कृष्णशिला पर बनाई गई है और इसका वजन 150 से 200 किलोग्राम है।
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विषय ः बढ़ता कर्ज अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती