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बच्चों को डांटेंगे तो बनेंगे ढीठ, प्यार से समझाओ

Mon, 11 Apr 2016 02:24 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक Updated Mon, 11 Apr 2016 02:24 AM IST
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 The children will then Dantenge brash him with love
डॉ. अरुणा बरूटा - फोटो : अमर उजाला
बच्चों की पढ़ाई को लेकर ज्यादातर अभिभावक चिंतित रहते हैं। खासकर महिलाओं की एक ही शिकायत होती है कि मेरा बच्चा तो पढ़ता ही नहीं है, जैसे-तैसे स्कूल जाता है और वहीं जो कुछ पढ़ता-लिखता है, बस। घर आने के बाद तो किताब छूता तक नहीं। लेकिन उन्हें बार-बार डांटना भी ठीक नहीं है। इससे उन पर शारीरिक और मानसिक तौर से गलत असर पड़ेगा और वे ढीठ बन जाएंगे। इसलिए जितना हो सके, अभिभावक बच्चों को प्यार से समझाएं।
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यह बात मुख्य वक्ता दिल्ली की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. अरुणा बरूटा ने कही। वे रविवार को एमडीयू के टैगोर सभागार में एक निजी एजुकेशन अकादमी की ओर से हुई अभिभावकों की वर्कशॉप में बोल रही थीं। दो घंटे की वर्कशॉप में डॉ. बरूटा ने न केवल कारगर पेरेंटिंग टिप्स दिए, बल्कि अभिभावकों की विभिन्न समस्याओं का समाधान भी किया। 
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उन्होंने कहा कि बच्चों को परिवार में प्रेम से रहना सिखाना है तो बड़ों को अनुशासन की नींव खड़ी करनी होगी। उन्हें भी अनुशासन में रहकर व्यवहार करना होगा, तभी बच्चे आपसी सौहार्द में रहना सीख पाएंगे। अमूमन संयुक्त परिवार में देखा गया है कि जब कभी मां अपने बच्चे को गलत काम पर डांटती है तो परिजन उल्टा मां को डांटने लगते हैं। ऐसा करने से बच्चों के मानसिक पटल पर गलत असर पड़ता है और वह अपनी मां को कम सम्मान देना शुरू कर देते हैं।
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इसलिए दादा-दादी या पति, कभी भी बच्चों के सामने मां को न डांटें। जब बच्चा सो जाए या बाहर खेलने चला जाए, तो मां से बात करें। उन्होंने कहा कि बच्चों को तब महत्व बिल्कुल न दें, जब वे रो रहे हों। अगर वह गलत है तो उसे रोने दें और जब वह शांत हो जाए या उस बात को भूल जाए, तो उसे समझाएं। इस स्थिति में वे आपकी बात को जरूर समझेंगे और माफी भी मानेंगे। माताएं अपने दिल में कभी भी इस बात का पश्चाताप न रखें कि उन्होंने अपने एक साल या दो साल के बच्चे को डांटकर बुरा किया है।

एक्टर से पहले पापा हैं बच्चों के रोल मॉडल
डॉ. बरूटा ने कहा कि बच्चों के लिए एक्टर से पहले उनके पापा ही रोल मॉडल होते हैं, क्योंकि वे शुरू से ही अपने मम्मी-पापा को देखते हुए ही बडे़ हुए हैं। इसलिए भूल करके भी पति और पत्नी बच्चों के सामने झगड़ा न करें, या गाली न दें। इससे उनके दिमाग पर बुरा असर तो पड़ता ही है। साथ ही, उनके अवचेतन दिमाग में गालियां घर कर जाती हैैं। जिसे वे स्कूल या कॉलेज में अपने दोस्तों के सामने इस्तेमाल करते हैं।



अंक नहीं, रुचि के अनुसार चुनने दें स्ट्रीम
डॉ. अरुणा बरूटा ने कहा कि अधिकतर स्कूल और कॉलेज के प्राचार्यों की मैथेलॉजी बच्चों के मामले में गलत होती है। वे उन प्राचार्यों से मिलना भी चाहती हैं जो अंक के आधार पर बच्चों की स्ट्रीम यानी करिअर का फैसला करते हैं। बच्चों के करिअर का मुख्य समय 10वीं के बाद होता है। इसलिए अंकों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी रुचि के अनुसार उन्हें ऑर्ट्स, साइंस या कॉमर्स स्ट्रीम दें।
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