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#हिंदीहैंहमः हिंदी को बढ़ावा देने में साहित्यकारों व शिक्षकों की जिम्मेदारी ज्यादा, विद्यार्थी भी आगे आएं

Thu, 27 Aug 2020 02:29 PM IST
रोहतक ब्यूरो अमर उजाला, रोहतक
अमर उजाला, रोहतक Published by: रोहतक ब्यूरो Updated Thu, 27 Aug 2020 02:29 PM IST
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Amar Ujala Campaign Hindi Hain Hum, teacher responsiblity for hindi language
Hindi Hai Hum - फोटो : अमर उजाला
हिंदी को मातृभाषा का दर्जा देना जरूरी है। अपनी पहचान की एक भाषा को आगे लाना होगा। इस काम में साहित्यकारों, भाषाविदों व शिक्षकों की जिम्मेदारी ज्यादा हैं। हिंदी को प्रोत्साहन देने के साथ शोध भी जरूरी है। हिंदी के लोग ही इसे पीछे खींच रहे हैं। इस कारण हम अपनी ही भाषा को भूल रहे हैं। विशेषज्ञों को हिंदी के सरलीकरण, भाषा को रुचिकर व आसान बनाने पर ध्यान देना होगा।
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हिंदी हमारी मातृभाषा है। किसी भी देश के लिए मातृभाषा जरूरी भी है। लोग ही हिंदी को पीछे खींच रहे हैं। हालात ये हैं कि नई पीढ़ी को उच्चारण तक नहीं आता है। ऐसे में मातृभाषा को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। भाषा के उच्चारण से उसकी वर्तनी तक का पता लग जाता है। हम अपनी ही मूल भाषा को भूलने लगे हैं। शब्द मुश्किल हैं तो इन्हें आसान करने की जरूरत है। शोध पर ध्यान देना होगा। नए शब्द बनाने होंगे। यह काम साहित्यकारों, भाषाविदों, शिक्षकों का है। उनकी जिम्मेदारी मातृ भाषा को आगे लाने में उसे प्रोत्साहन देने की ज्यादा है। उन्हें अगली पंक्ति में आकर काम करना चाहिए।
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- डॉ. वेदप्रकाश श्योराण, पूर्व प्राचार्य, नेकीराम शर्मा कॉलेज

हिंदी हमारी आम बोलचाल की भाषा है। यानी मातृभाषा। इसे बोलने में लोग शर्म न समझें। मोबाइल पर सारा दिन अंग्रेजी में शब्द लिखने वाले हिंदी का प्रयोग करें। स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाए। दैनिक जीवन के साथ सोशल मीडिया भी इसे प्रयोग किया जाए। इसे कामकाजी भाषा बनाया जाए। पुलिस विभाग वर्तमान में भी उर्दू प्रयोग हो रही है। इसमें सुधार कर हिंदी के प्रयोग पर जोर देने की जरूरत है। ज्यादा से ज्यादा गोष्ठी, संवाद कराए जाएं। समाचार पत्रों को भी प्रोत्साहन दिया जाए।
- डॉ. कपिल कौशिक, शिक्षक, गौड़ ब्राह्मण डिग्री कॉलेज

हिंदी को बढ़ावा देना है तो मन से यह कोशिश करनी होगी। मातृभाषा का सम्मान करना होगा। कार्यालयों में पत्राचार ही नहीं कामकाज में भी इसका प्रयोग करना होगा। हालांकि हिंदी में काम करने के निर्देश हैं, मगर कार्यालयों में इन निर्देशों की पालना कम ही होती है। ऐसे निर्देश सख्ती से लागू करने की जरूरत है। किसी भी देश में जाएं। वहां की मातृभाषा होती है। लोग भी उसी भाषा में बात व काम करते हैं। इसके बगैर किसी देश की पहचान असंभव है। हमें भी अपनी पहचान विकसित करनी होगी।
- पूनम भनवाला, प्राचार्य, राजकीय स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय
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