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ज्ञान वृद्धि के लिए वातावरण का निर्माण करता है बहुलवाद : प्रो. नरेंद्र
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रोहतक। पंचनद शोध संस्थान चंडीगढ़ के तत्वावधान में रोहतक विश्वविद्यालय अध्ययन केंद्र की ओर से ‘बहुलवाद, प्रतिस्पर्धा एवं विकास’ विषय पर ई-गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें मुख्य प्रस्तोता प्रो. नरेंद्र कुमार रुस्तगी, निदेशक सेंटर फॉर बिजनेस स्टडीज हॉवर्ड विश्वविद्यालय वाशिंगटन अमेरिका ने इस विषय पर प्रभावशाली प्रस्तुति दी। गोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. बृज किशोर कुठियाला अध्यक्ष पंचनद शोध संस्थान ने की।
गोष्ठी के प्रारंभ में रोहतक विश्वविद्यालय अध्ययन केंद्र अध्यक्ष प्रो. राजीव कुमार ने प्रो. बृज किशोर कुठियाला व मुख्य प्रस्तोता का अभिनंदन किया। अपनी प्रस्तुति में प्रो. नरेंद्र रुस्तगी ने सर्वप्रथम बहुलवाद से प्रगति व विकास में होने वाले प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी भी देश में बहुलवाद ज्ञान वृद्धि के लिए वातावरण का निर्माण करता है। इसकी वजह से ही पश्चिमी देशों का विकास हुआ। हमारे प्राचीन भारत का विकास भी बहुलवाद होने से देखने को मिला। वास्तव में बहुलवाद से उत्पन्न विविधता की वजह से ही विकास को गति मिलती है। इससे जो विकास होता है वह भी स्थिर व टिकाऊ होता है। बहुलवाद से न सिर्फ मनुष्य के व्यक्तिगत विकास को बल मिलता है साथ में उसके ज्ञान कौशल में भी निपुणता आती है। प्रतिस्पर्धा किसी भी सरकार के लिए नव चेतन एवं चिंतन का एक तरीका है। प्रतिस्पर्धा देश का विकास करने व उसे संजोकर रखने का सामर्थ्य देती है। इसके अलावा विश्व पटल पर व्यापार बढ़ाने के नए रास्ते दर्शाती है।
पंचनद शोध संस्थान के अध्यक्ष ने कहा कि प्रकृति में भी अनेकता व बहुलवाद है। अनेकता से निश्चय ही देश का विकास होता है। प्रश्नकाल का संचालन अध्ययन केंद्र के सचिव प्रो. अश्विनी धींगड़ा ने किया। गोष्ठी में देश के विभिन्न प्रांतों, विश्वविद्यालयों, कालेजों व पंचनद अध्ययन केंद्रों से 100 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए। इस मौके पर प्रो. सुषमा यादव, प्रो. पूर्णमल गौड़, डॉ. कृष्ण सिंह आर्या, प्रो. संजय मित्तल, प्रो. जगदीश बत्रा, प्रो. वजीर नेहरा, प्रो. गुलशन तनेजा, प्रो. प्रमोद भारद्वाज, प्रो. जयप्रकाश यादव, राजेंद्र अवस्थी, प्रो. लवलीन मोहन, प्रो. असीम मिगलानी, प्रो. सुशील तोमर, डॉ. नरेश भार्गव, डॉ. दीपक छाबड़ा, डॉ. विक्रम अरोड़ा, डॉ. अनुपम भाटिया मौजूद रहे।
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गोष्ठी के प्रारंभ में रोहतक विश्वविद्यालय अध्ययन केंद्र अध्यक्ष प्रो. राजीव कुमार ने प्रो. बृज किशोर कुठियाला व मुख्य प्रस्तोता का अभिनंदन किया। अपनी प्रस्तुति में प्रो. नरेंद्र रुस्तगी ने सर्वप्रथम बहुलवाद से प्रगति व विकास में होने वाले प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी भी देश में बहुलवाद ज्ञान वृद्धि के लिए वातावरण का निर्माण करता है। इसकी वजह से ही पश्चिमी देशों का विकास हुआ। हमारे प्राचीन भारत का विकास भी बहुलवाद होने से देखने को मिला। वास्तव में बहुलवाद से उत्पन्न विविधता की वजह से ही विकास को गति मिलती है। इससे जो विकास होता है वह भी स्थिर व टिकाऊ होता है। बहुलवाद से न सिर्फ मनुष्य के व्यक्तिगत विकास को बल मिलता है साथ में उसके ज्ञान कौशल में भी निपुणता आती है। प्रतिस्पर्धा किसी भी सरकार के लिए नव चेतन एवं चिंतन का एक तरीका है। प्रतिस्पर्धा देश का विकास करने व उसे संजोकर रखने का सामर्थ्य देती है। इसके अलावा विश्व पटल पर व्यापार बढ़ाने के नए रास्ते दर्शाती है।
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पंचनद शोध संस्थान के अध्यक्ष ने कहा कि प्रकृति में भी अनेकता व बहुलवाद है। अनेकता से निश्चय ही देश का विकास होता है। प्रश्नकाल का संचालन अध्ययन केंद्र के सचिव प्रो. अश्विनी धींगड़ा ने किया। गोष्ठी में देश के विभिन्न प्रांतों, विश्वविद्यालयों, कालेजों व पंचनद अध्ययन केंद्रों से 100 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए। इस मौके पर प्रो. सुषमा यादव, प्रो. पूर्णमल गौड़, डॉ. कृष्ण सिंह आर्या, प्रो. संजय मित्तल, प्रो. जगदीश बत्रा, प्रो. वजीर नेहरा, प्रो. गुलशन तनेजा, प्रो. प्रमोद भारद्वाज, प्रो. जयप्रकाश यादव, राजेंद्र अवस्थी, प्रो. लवलीन मोहन, प्रो. असीम मिगलानी, प्रो. सुशील तोमर, डॉ. नरेश भार्गव, डॉ. दीपक छाबड़ा, डॉ. विक्रम अरोड़ा, डॉ. अनुपम भाटिया मौजूद रहे।
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