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पहलम तो खंडके दिख्या करते, इब तै लुगाइयां का राज आग्या

Sun, 10 Jan 2016 01:17 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक Updated Sun, 10 Jan 2016 01:17 AM IST
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now women will fight sarpanch election
 भाई! पहले पंचायत होया करती। लोग सरपंचों को मानते भी थे। बैठकों में
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बुजुर्गों के खंडके दिख्या करते, पर इब तै लुगाइयां का राज आग्या। इन दो दोस्तों की बूढ़ी आंखों को 1952 का पंचायत चुनाव आज भी याद है। सामने खड़े पीपल के पेड़ की ओर इशारा कर बताते हैं कि बेटा, पहला चुनाव इसी पेड़ के नीचे हुआ था।

 चुनाव भी क्या था। जिस उम्मीदवार के पक्ष में जितने वोटर बैठे, वही सरपंच बन गया और गांव की पहली सरपंची का ताज मेरे दादा रत्न के सिर ही सजा था।

पंचायत चुनाव की पूर्व संध्या पर पोस्टरों से पटे शिमली गांव की बैठक में बैठकर 87 साल के करतारा और 82 साल के रिटायर्ड नायब सूबेदार प्यारे लाल ने यह कहानी सुनाई। करतारा के दादा गांव के पहले सरपंच थे। दोनों बताते हैं कि पहले एक भी रुपया खर्च नहीं होता था तो अब लाखों रुपया लुटाया जा रहा है।

पहले तो बस गांव से बाहर रह रहे वोटर को गांव तक लाने के लिए उम्मीदवार किराया दे देते थे। हुक्के की कश मारकर करतारा प्यारे लाल की ओर इशारा कर कहते हैं कि पहले पुरुषाें की चौधर होती थी, लेकिन अब तो हम केवल देखने वाले रह गए। अब तो घर और पंचायत दोनों जगह महिलाओं का राज आ गया।

यूं हुआ पहला चुनाव
शामली गांव का पहला चुनाव करतारा के दादा रतन और हजारी के बीच लड़ा गया। गांव के लोगों को इकट्ठा कर लिया गया और रतन व हजारी को खड़ा कर दिया गया।

 लोगों को कह दिया गया कि जिसे भी सरपंच बनाना चाहते हो, उसके पीछे खड़े हो जाओ। लोगों ने उन दोनों के पीछे लाइन लगा दी और रतन की लाइन बड़ी होने के कारण उन्हें सरपंची मिल गई। रतन की पीढ़ी के पास छह बार गांव की चौधर रही। इस तरह खुलेआम चुनाव होने से मनभेद होने लगा तो फिर पर्ची डालकर सरपंच चुना जाने लगा।

लोग नाम की पर्ची बनाकर बक्से में डाल देते थे और सरपंच की घोषणा हो जाती थी। 1957 में पर्ची से चुनाव हुआ। फिर बैलेट पेपर से चुनाव कराया गया तो अब ईवीएम मशीन। नायब सूबेदार प्यारेलाल बताते हैं कि पहले चुनाव में प्रत्याशी न शराब पिलाते थे और न ही कोई डिमांड करता था। 
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