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1971 की लड़ाई में भारत-पाक युद्ध में हुए थे शहीद, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रा गांधी ने भेजा था संवेदना पत्र

Sat, 08 Feb 2020 01:51 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sat, 08 Feb 2020 01:51 AM IST
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Martyrs were killed in Indo-Pak war in 1971 war, then Prime Minister Indra Gandhi sent a letter of condolence
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खरावड़ गांव के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में शनिवार को उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला शहीद सैनिक ओमप्रकाश की प्रतिमा का अनावरण करेंगे। शहीद ओमप्रकाश 1971 में भारत-पाक युद्ध में 4 नवंबर को ढाका में शहीद हुए थे। इस युद्ध में ही पूर्वी पाकिस्तान एक अलग देश बांग्लादेश बना था। इसी युद्ध में पाकिस्तान के एक लाख के करीब सैनिकों ने सरेंडर कर दिया था। शहीद ओमप्रकाश भी सेकेंड जाट रेजिमेंट की तरफ से इस युद्ध में उतरे थे, जहां पहले गोरिला युद्ध फिर जंगली क्षेत्र में लड़ाई लड़ते हुए उन्होंने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिये थे। दुश्मनों से लोहा लेते हुए वह 24 साल की उम्र में दुश्मनों की गोली लगने से शहीद हो गए। युद्ध में शहीद होने के बाद परिवार को सांत्वना देने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रा गांधी ने संवेदना पत्र भेजा था। इसके बाद रक्षा मंत्री व अन्य नेताओं के ओर से भी संवेदना पत्र आए। यह बात उनके भाई पूर्व सैनिक नायब सूबेदार धन सिंह ने बताई।
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चार भाइयों में से तीन सैनिक तो एक रहे स्वतंत्रता सेनानी
धन सिंह ने बताया कि वह तीन चार भाई थे, जिनमें से वह खुद, शहीद ओमप्रकाश और मुंशीराम तीनों सेना में थे। वह और मुंशीराम नायब सूबेदार के पद से रिटायर्ड हुए। वह खुद आर्मी एजूकेशन कोर में भर्ती हुए थे। वहीं भाई चंदन सिंह 1957 के हिंदी आंदोलन में स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं, जिनका गत दिवस पहले ही स्वर्गवास हुआ है।
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साढ़े तीन माह पहले छुट्टी पूरी कर गए थे, शहीद होने के करीब पांच दिन बाद घर पहुंचा टेलीग्राफ
ओमप्रकाश साढ़े तीन माह पहले अपनी छुट्टी पूरी कर यूनिट में चले गए थे। जहां से ऑर्डर होने पर वह बटालियन के साथ ही बांग्लादेश चले गए थे। फिर 9-10 नवंबर के पास घर पर टेलीग्राफ पहुंचा। जिसे पिता हरके सिंह ने किसी से पढ़वाया और पत्र पढ़ते ही गांव में गमगीन माहौल हो गया। उसके कुछ दिन बाद यूनिट से उनके दस्तावेज व लेटर लेकर वहां के जवान आए। भाई धनसिंह ने कहा कि उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यह सब हो जाएगा।
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शहीद हुए उस समय बेटा था एक साल का, पार्थिव शरीर भी नहीं आता था घर
1971 में जब ओमप्रकाश शहीद हुए तो उनका इकलौता बेटा दिलबाग सिंह एक वर्ष का था। पत्नी धनपति गृहिणी थी। परिवार को जब पांच दिन बाद पता चला कि ओमप्रकाश शहीद हो गए हैं तो गांव में गम का माहौल हो गया था। धनसिंह बताते हैं कि उस समय शहीद का पार्थिव शरीर भी घर नहीं आता था। जिस कारण वो उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाए। बेटा दिलबाग अब दिल्ली में खुद का काम कर रहा है।
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