भगवान... ऐसा दिन दुश्मन को भी न दिखाए
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69 वर्षों में पहली बार ऐसा भयावह मंजर देखने को मिला। पिछले 5 दिनों के अंदर रोहतक शहर में उपद्रवियों ने जो आतंक मचाया, अब कभी भी भुलाए नहीं भूलेगा। उन्होंने हमें मारने के लिए दो बार घुसने की कोशिश की, पर जब हिम्मत से उनका सामना किया तो वह भाग गए। हमनें दिन-रात दहशत में बिताए। हर पल आंखों में यहीं डर था कि कहीं उपद्रवी हमें उजाड़ने के लिए न आ जाए।
इस डर से तो बच्चों का तो रो-रो कर बुरा हाल हो गया। बहुत मुश्किल से उन्हें सुलाते थे, लेकिन थोड़ी देर बाद वह उठकर फिर से रोने लगते। रसोई में सिर्फ चावल और आटा ही था, प्याज और नमक के साथ ही रोटी खाकर दिन बिताए। जाट आरक्षण की ये आग तो 1947 के दंगों की याद दिला गई। उस समय तो हिंदू-मुसलमान के बीच लड़ाई थी, लेकिन अब हमारे अपने ही हमारे खिलाफ थे। भगवान... ऐसे दिन किसी दुश्मन को भी न दिखाए। उपद्रवियों के खौफनाक मंजर को गांधी नगर वासियों ने कुछ इस तरह बयां किया। भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद से काफी संख्या में पंजाबी समुदाय के लोग शहर में आए और गांधी के नाम पर एक नगर बसाया। फिर, धीरे-धीरे यहां सभी बिरादियों के लोगों ने बसना शुरू कर दिया। यहां के लोगों के भाईचारे से सब वाकिफ है। यहीं वजह है कि उपद्रवियों द्वारा दो बार घुसने की कोशिश की गई, पर वह नाकाम रहे। क्योंकि, सुरक्षा का जिम्मा पुलिस और प्रशासन ने नहीं, बल्कि गांधी नगर के लोगों ने संभाला था। दिन-रात लोगों द्वारा ठीकरी पहरा दिया गया, इसमें महिलाओं की भी भागीदारी रही।
जाट आरक्षण की आग में सुलगे रोहतक शहर में पिछले दिनों जो कुछ भी घटा, वह मंजर भुलाए नहीं भूलता है। जहां पूरे 5 दिन बिजली और पानी की किल्लत से लोगों को जूझना पड़ा। वहीं, उपद्रवियों के आने का डर भी पल-पल सताता रहा। पहली बार रामलीला ग्राउंड की तरफ से उपद्रवियों ने घुसने की कोशिश की, पर वह आगे नहीं बढ़ पाए। उनके सामने काफी संख्या में हम लोग खड़े थे। हमने पूरे हिम्मत से उनका सामना किया और भगा दिया। - सोमनाथ।
5 साल के थे, जब मैं पाकिस्तान से आकर यहां बसा। उपद्रव उस समय भी हुआ था, लेकिन अब की बार का ज्यादा भयावह है। 72 साल की उम्र में ऐसा दंगा पहली बार देखा, जिसमें अपनों ने ही रोहतक शहर को पूरी तरह से जलाकर राख कर दिया। उपद्रवियों ने सरकुलर रोड और बजरंग भवन समीप रोड से दो बार घुसने की कोशिश की। वह हथियारों से लैस थे और हमारे पास सिर्फ डंडे और ईटें थी। मौत सामने खड़ी दिखाई दे रही थी, पर हम लोगों के हौसलों से यह हार गई। - इंद्र सेन सोनी।
पिछले एक हफ्ते में बहुत बुरा समय देखने को मिला। बेशक अभी माहौल थोड़ा ठीक है, लेकिन डर कम नहीं हुआ है। पांच दिनों से चैन की नींद नहीं ले पाए है, जब भी आंख लगती है तो उपद्रवियों के आने के डर से खुल जाती है। तीन दिन तो बिना दूध और सब्जियों के निकाले। मेरे बच्चे तो इतने सहम गए है कि अब बाहर निकलने से डरते है। रात-रात भर वह रोए है। उन्हें सुरक्षा का अहसास देने के लिए मैं खुद रात-रात भर जागी हूं। - सोनिया।
दंगाइयों ने पूरे रोहतक शहर को तबाह कर दिया है। हर पल ऐसा महसूस हुआ कि मौत हमारे बहुत करीब खड़ी है। मैंने 40 साल की उम्र में ऐसा भयावह मंजर देखा। मेरी एक छोटी सी दुकान है। जिसमें मैं सिलाई का काम करके घर का खर्च चलाती हूं। हर समय मन में डर सताता रहा कि कहीं मेरी रोजी-रोटी न छीन जाएं। पर, इस मुश्किल समय में गांधी नगर के लोगों की एकता ने मेरी हिम्मत नहीं टूटने दी। आज पांच दिन बाद दुकान खोली है, पर डर अभी भी है। - सुदेश।
उपद्रवी दिल्ली बाईपास से अशोका चौक तक दुकानों को जलाते आ रहे थे। इस बीच गांधी नगर बाजार होने की वजह से दुकानदारों को बहुत डर लग रहा था। मौत तो नजदीक थी, लेकिन दुकानदारों और कालोनी के लोगों की हिम्मत के कारण मैं बुरे समय का सामना कर पाया। हमनें 50-50 लोगों की टोलियां बनाई। जिसने छह-छह घंटे के अंतराल से दिन-रात पहरा दिया। आज बाजार जरूर खुला है, लेकिन अभी भी हम दुकानदारों के दिल से डर नहीं गया है। - राधेश्याम ढल।
हमारे अपने तो शहर को लूटकर चले गए, लेकिन गांधी नगर बाजार के भाईचारे ने इसे लूटने से बचा लिया। इस उम्र के पड़ाव पर जो दर्द हमें अपनों ने दिया है, उसे शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है। अपनी रोजी-रोटी और परिवार को बचाने के लिए जान हथेली पर रखकर दिन-रात मोर्चे पर डटे रहे। उनके पास हथियार थे, पर हमारे पास केवल डंडों के साथ भाईचारा था। जिसके चलते हम इस मुश्किल घड़ी का सामना डटकर कर सकें। - डॉ. महेश मदान।
66 साल की उम्र में मेरे अपनों से ही धोखा देखने को मिलेगा, यह कभी सोचा नहीं था। मेरे पूरे परिवार के लोगों के दिल में इस घटना ने इतनी दहशत भर दी है कि वे घरों से बाहर निकलने में भी डरते है। सेना, पुलिस और प्रशासन से तो सुरक्षा की उम्मीद टूट गई थी, ऐसे में अपनी सुरक्षा हमें खुद ही करनी थी। अकेले करना तो मुश्किल था, लेकिन कालोनी के लोगों की मदद से यह सब संभव हो पाया। नहीं तो अपने रिहायश को बचाना बहुत मुश्किल था। - कृष्णलाल।
60 साल बिता दिए, पर ऐसा भयावह नजारा मैंने अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा। उपद्रवियों ने ऐसा माहौल पूरे रोहतक में बना दिया कि हर व्यक्ति को अपनी जान बचाना मुश्किल हो गया। ऐेसे समय में केवल मुझे और मेरे परिवार को केवल हमारी एकता ही बचा सकती थी। एक ओर भाईचारा खत्म हो रहा था तो दूसरी ओर मेरी कालोनी के लोगों ने अपना भाईचारा दिखाया। यह हमारा भाईचारा ही है कि आज हम सुरक्षित है - सोमलाल।
पांच दिन पहले सुबह के समय हजारों की संख्या में उपद्रवी चिन्योट कालोनी की ओर बढ़े। तब गलियों में सुरक्षा के लिहाज से लगाए गए सभी चारों गेट बंद कर दिए गए। लोग अपनी घरों की छतों पर चढ़ गए। उपद्रवी आए और एक के बाद एक घरों पर पत्थरों से हमला करने लगे। मैंने भी अपनी सुरक्षा के लिए उन पर पथराव किया, पर लेबर चौक से गांधी नगर और कालोनी के लोग भी काफी संख्या में आए और उनका सामना किया। लोगों की एकता की वजह से ही आज हम सुरक्षित है, जिंदा है। - राहुल। मैंने 10 साल पहले नए बस स्टैंड पर वीटा बूथ शुरू किया। जिसके सहारे परिवार का गुजारा चल रहा था। लेकिन उपद्रवियों ने मेरा सब कुछ जला दिया। इसमें करीब तीन लाख रुपये का सभी खाद्य पदार्थ आग में जलकर खाक हो गया है। अब परिवार का गुजारा करने का दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा है। उपद्रवियों ने तो मेरी रोजी-रोटी का एकमात्र सहारा ही छीन लिया। - संजय।