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Rewari News: पशुओं को बीमारियों से बचाने के लिए टीके लगवाएं पशु पालक
Fri, 02 Aug 2024 12:07 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Fri, 02 Aug 2024 12:07 AM IST
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फोटो : 01रेवाड़ी। कोसली मेें बंधी भैंसें। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
रेवाड़ी। वर्षा ऋतु में पशुओं में रोग होने की आशंका होती है। आंतरिक और वाह्य परजीवियों के कारण बीमारियां होती हैं। ऐसे में पशुओं की विशेष देखरेख की जरूरत होती है।
पशु चिकित्सकों का कहना है कि पशुओं में चीचड़ जूं व व पेट के कीड़ों की समस्या बन जाती है जिससे पशु कमजोर हो जाते हैं। पशु जुकाम, निमोनिया व कई तरह की फफूंदजनक बीमारियों से पीड़ित होते हैं और चरना बंद कर देते हैं। इससे पशुओं का दूध घट जाता है। राजकीय पशु चिकित्सालय नाहड़ की वेटरनरी सर्जन डॉ. नीलम यादव ने बताया कि बारिश में पशुओं को वाह्य और आंतरिक परजीवियों से बचाने के लिए पशु चिकित्सक के परामर्श से कृमि नाशक दवा अवश्य दें। संक्रामक रोगों से बचाव के लिए टीके लगवाएं। वाह्य परजीवियों को नियंत्रित करने के लिए कृमि नाशक दवा का छिड़काव करें। पशुओं के बाड़े में हवा का उचित प्रबंध करें।
पशुओं में थनैला रोग होने की अधिक आशंका
नीलम यादव ने बताया कि पशुओं को थनैला रोग से बचाकर पशुपालक आर्थिक हानि से बच सकते हैं। सूखे चारे में गीलापन या फफूंद न लगी हो। हरा चारा साफ होना चाहिए। उसमें कीचड़ न लगी हो। पशुओं को साफ सुथरा पानी पिलाएं। बारिश के मौसम में बाड़ा लगातार गीला रहने से पशुओं के खुरों में संक्रमण की संभावना ज्यादा बनी रहती है। इसलिए हफ्ते में एक या दो बार पशुओं के खुरों को हल्के लाल दवाई के घोल से साफ करना चाहिए। पशुओं के बाड़े के आसपास पानी का ठहराव नहीं होने देना चाहिए क्योंकि ऐसी जगह पर बीमारियों के प्रवाहक मच्छर व मक्खी पनपते हैं। इनकी रोकथाम के लिए जल ठहराव की जगह पर केरोसिन का तेल डाला जा सकता है।
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रेवाड़ी। वर्षा ऋतु में पशुओं में रोग होने की आशंका होती है। आंतरिक और वाह्य परजीवियों के कारण बीमारियां होती हैं। ऐसे में पशुओं की विशेष देखरेख की जरूरत होती है।
पशु चिकित्सकों का कहना है कि पशुओं में चीचड़ जूं व व पेट के कीड़ों की समस्या बन जाती है जिससे पशु कमजोर हो जाते हैं। पशु जुकाम, निमोनिया व कई तरह की फफूंदजनक बीमारियों से पीड़ित होते हैं और चरना बंद कर देते हैं। इससे पशुओं का दूध घट जाता है। राजकीय पशु चिकित्सालय नाहड़ की वेटरनरी सर्जन डॉ. नीलम यादव ने बताया कि बारिश में पशुओं को वाह्य और आंतरिक परजीवियों से बचाने के लिए पशु चिकित्सक के परामर्श से कृमि नाशक दवा अवश्य दें। संक्रामक रोगों से बचाव के लिए टीके लगवाएं। वाह्य परजीवियों को नियंत्रित करने के लिए कृमि नाशक दवा का छिड़काव करें। पशुओं के बाड़े में हवा का उचित प्रबंध करें।
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पशुओं में थनैला रोग होने की अधिक आशंका
नीलम यादव ने बताया कि पशुओं को थनैला रोग से बचाकर पशुपालक आर्थिक हानि से बच सकते हैं। सूखे चारे में गीलापन या फफूंद न लगी हो। हरा चारा साफ होना चाहिए। उसमें कीचड़ न लगी हो। पशुओं को साफ सुथरा पानी पिलाएं। बारिश के मौसम में बाड़ा लगातार गीला रहने से पशुओं के खुरों में संक्रमण की संभावना ज्यादा बनी रहती है। इसलिए हफ्ते में एक या दो बार पशुओं के खुरों को हल्के लाल दवाई के घोल से साफ करना चाहिए। पशुओं के बाड़े के आसपास पानी का ठहराव नहीं होने देना चाहिए क्योंकि ऐसी जगह पर बीमारियों के प्रवाहक मच्छर व मक्खी पनपते हैं। इनकी रोकथाम के लिए जल ठहराव की जगह पर केरोसिन का तेल डाला जा सकता है।
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