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Panipat News: सैन्य कर्मी सुरजीत के पार्थिव शरीर का शेरा गांव में अंतिम संस्कार
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मतलौडा (पानीपत)। सेना की राष्ट्रीय राइफल बटालियन के दिवंगत हवलदार पानीपत के शेरा गांव निवासी सत्यजीत (25) का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव पहुंचा तो घर में कोहराम मच गया। परिजनों का क्रंदन सुनकर वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। बुधवार को उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। सत्यजीत के छोटे भाई अर्पित ने उन्हें मुखाग्नि दी।
सत्यजीत का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 11 बजे सेना की एंबुलेंस से दिल्ली से मतलौडा लाया गया। वहां अंतिम दर्शन के लिए रखे जाने के बाद पार्थिव शरीर को मोटरसाइकिलों व ट्रैक्टरों के काफिले के साथ शेरा गांव लाया गया। यहां सेना के जवानों के साथ-साथ उसके दोस्तों व परिवार के सदस्यों ने पार्थिव शरीर को कंधा दिया।
पिता बोले- सेना की ओर से सम्मान मिलना चाहिए था ःपिता सज्जन कुमार ने बताया कि उसके बेटे सत्यजीत की मौत गोली लगने से हुई है। गोली कैसे चली है कि इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। उसके पास मंगलवार सुबह इस संबंध में कॉल आई थी कि सत्यजीत की ड्यूटी पर मौत हो गई है। मौत के कारण उन्हें नहीं बताए गए। सत्यजीत नौ फरवरी को ही श्रीनगर में ड्यूटी पर गया था।
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यहां सेना ने बेटे सत्यजीत को सलामी तक नहीं दी। इससे उनका मन दुखी है। उन्होंने अपनी पूरी उम्र देश सेवा में लगा दी। बेटे को भी देश के लिए कुर्बान कर दिया है। सेना की ओर से सुरजीत को सम्मान मिलना चाहिए था। उन्होंने इस बात पर भी अफसोस कि अंतिम संस्कार में प्रशासन की ओर से कोई बड़ा अधिकारी नहीं पहुंचा। इस पर ग्रामीणों में भी रोष नजर आया।
सत्यजीत का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 11 बजे सेना की एंबुलेंस से दिल्ली से मतलौडा लाया गया। वहां अंतिम दर्शन के लिए रखे जाने के बाद पार्थिव शरीर को मोटरसाइकिलों व ट्रैक्टरों के काफिले के साथ शेरा गांव लाया गया। यहां सेना के जवानों के साथ-साथ उसके दोस्तों व परिवार के सदस्यों ने पार्थिव शरीर को कंधा दिया।
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पिता बोले- सेना की ओर से सम्मान मिलना चाहिए था ःपिता सज्जन कुमार ने बताया कि उसके बेटे सत्यजीत की मौत गोली लगने से हुई है। गोली कैसे चली है कि इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। उसके पास मंगलवार सुबह इस संबंध में कॉल आई थी कि सत्यजीत की ड्यूटी पर मौत हो गई है। मौत के कारण उन्हें नहीं बताए गए। सत्यजीत नौ फरवरी को ही श्रीनगर में ड्यूटी पर गया था।
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यहां सेना ने बेटे सत्यजीत को सलामी तक नहीं दी। इससे उनका मन दुखी है। उन्होंने अपनी पूरी उम्र देश सेवा में लगा दी। बेटे को भी देश के लिए कुर्बान कर दिया है। सेना की ओर से सुरजीत को सम्मान मिलना चाहिए था। उन्होंने इस बात पर भी अफसोस कि अंतिम संस्कार में प्रशासन की ओर से कोई बड़ा अधिकारी नहीं पहुंचा। इस पर ग्रामीणों में भी रोष नजर आया।