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Panipat News: अभिग्रहधारी डॉ. राजेश मुनि महाराज ने किया चातुर्मास के लिए प्रवेश

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 20 Jul 2026 06:02 AM IST
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Dr. Rajesh Muni Maharaj, an observer of strict vows, has entered the city for Chaturmas.
गांधी अग्रवाल मंडी में डॉ. राजेश मुनि महाराज व अन्य। स्रोत : स्वयं
पानीपत।गांधी मंडी स्थानक में रविवार को अभिग्रहधारी डॉ. राजेश मुनि महाराज (ठाणे-2) ने चातुर्मास हेतु प्रवेश किया। इस दौरान उन्होंने गांधी मंडी का भ्रमण किया।
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गांधी मंडी जैन समाज के संरक्षक डॉ. एपी जैन ने बताया कि आप 4 जून, 2026 को इंदौर से इस भीषण गर्मी में लगभग 1000 किलोमीटर की दूरी नंगे पांव पदयात्रा द्वारा पूरी करके आज पानीपत पधारे हैं। आपकी अगवानी साध्वी श्री समता जी महाराज तथा सभा प्रधान श्री जगदीश जैन सहित बड़ी संख्या में स्थानीय एवं बाहर से पधारे समाज के उत्साही भक्तजनों ने की। महाराज का जन्म सन् 1973 में मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के इच्छापुर गांव में हुआ। जन्म से ही आप विलक्षण प्रतिभा के धनी होने के साथ धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत रहे। आपने सन 2001 में जैन भागवती दीक्षा अंगीकार करके भगवान महावीर की साधना और कठोरता को अपने जीवन का आधार बनाया। दीक्षा के बाद से ही बेले-बेले (दो उपवास-पारणा, फिर दो उपवास-पारणा...) की तपस्या प्रारंभ की वह भी मन में यह धारणा करके कि कुछ बातें पूरी होंगी तो पारणा करूंगा नहीं तो उपवास जारी रहेंगे। अभिग्रह संख्या एक से 13 तक रही है। अभिग्रह कठिन रहे हैं जैसे एक अभिग्रह था कि कुत्ता-बिल्ली-चूहा एक के ऊपर एक हों। अभिग्रह न फलने के कारण कई बार तपस्या लगातार पांच दिन तक भी चली है। 17 जुलाई 2026 तक 2471 अभिग्रह पूरे हो चुके हैं जो एक नया कीर्तिमान है। अब तक आप पांच हजार से भी अधिक दिन उपवास में रहे हैं। इंदौर से पानीपत के बीच में एक दिन 70 किलोमीटर पदयात्रा करके अपना ही एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। आप एक कुशल संथारा विशेषज्ञ हैं। आपने संथारा विषय पर पीएचडी की है और अभी तक 132 मुमुक्षु आत्माओं को संथारे दिलवा चुके हैं।
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भगवान महावीर स्वामी के अभिग्रह के संरक्षक डॉ. एपी जैन ने बताया कि अभिग्रह के लिए मुनि महाराज ने स्वयं भगवान महावीर स्वामी का अनुसरण किया। अब से लगभग 2600 वर्ष पूर्व भगवान महावीर स्वामी ने कठिन 13 अभिग्रह किए थे जिनके कारण उन्हें लगातार पांच महीने 24 दिन तक पारणा-विहीन रहना पड़ा था।
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