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डॉक्टरों को ट्रेनिंग ही नहीं मिली, 15 लाख की फेको मशीन हो गई खराब
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पानीपत। सिविल अस्पताल में मोतियाबिंद का ऑपरेशन आज भी पुरानी पद्धति से ही कराने को मरीज मजबूर हैं। टांकों वाली सर्जरी ही करानी पड़ती है, जबकि अस्पताल में बिना टांकों के ऑपरेशन करने वाली फेको मशीन 14 साल से है। डॉक्टरों के प्रशिक्षण के अभाव में यह मशीन रखे-रखे ही खराब हो गई, क्योंकि फेको मशीन को चलाने का प्रशिक्षण ही डॉक्टरों को नहीं दिया गया।
इस फेको मशीन से वर्ष 2015 में महज तीन सर्जरी ही की गई थीं। इस मशीन से उच्च तकनीक के जरिये बिना टांकों की सर्जरी होनी थी, इसके लिए तत्कालीन सर्जन डॉ. आशुतोष को जयपुर में ट्रेनिंग भी दिलाई गई थी। ट्रेनिंग पर एक लाख रुपये खर्च भी आया था लेकिन उनके जाने के बाद फिर किसी डॉक्टरों को ट्रेनिंग नहीं दी गई। जिन मरीजों को बिना चीरे वाले सर्जरी कराने होती है, उन्हें करनाल स्थित कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज, खानपुर मेडिकल कॉलेज या निजी अस्पतालों में जाना होता है।
यह है फेको मशीन से मोतियाबिंद के ऑपरेशन का फायदा
फेको मशीन से मोतियाबिंद का उपचार के लिए बड़े चीरे की आवश्यकता नहीं होती हैं। आंख में महज 2.8 एमएम का बारीक छेद किया जाता है। मशीन के माध्यम से मोतिया को आंख के अंदर ही घोल दिया जाता है। मशीन के जरिये ही फोल्डेबल लेंस को आंख के अंदर प्रत्यारोपित कर देते हैं। इसे माइक्रो फेको तकनीक कहते हैं। कोई इंजेक्शन नहीं लगाया जाता, दवा की कुछ बूंद डाली जाती हैं। ऑपरेशन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बिना दर्द हुए इस आपरेशन के बाद मरीज को आंखों पर पट्टी भी बांधनी नहीं पड़ती हैं।
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मशीन को ठीक कराने के प्रयास भी धीमे
सिविल सर्जन ने इस मशीन को दोबारा ठीक कराकर फेको सर्जरी के प्रयास शुरू किए थे। इस संबंध में डिप्टी सिविल सर्जन को निर्देश भी दिए गए थे। मशीन को चेक करने के लिए दिल्ली के इंजीनियर आने थे, लेकिन हुआ कुछ नहीं। एक माह बाद भी मशीन की जांच नहीं हो पाई है।
वर्जन:
डॉक्टरों की ट्रेनिंग के लिए लिखा गया पत्र : सिविल सर्जन
फेको मशीन की जांच कराई जाएगी। मशीन अगर खराब है तो उसे ठीक कराया जाएगा। डॉक्टरों के प्रशिक्षण के लिए मुख्यालय में पत्र लिखा गया है। उनका प्रयास है कि जल्द डॉक्टरों को प्रशिक्षण दिलाकर यहां फेको मशीन से सर्जरी शुरू हो।
- डॉ. जयंत आहूजा, सिविल सर्जन पानीपत।
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इस फेको मशीन से वर्ष 2015 में महज तीन सर्जरी ही की गई थीं। इस मशीन से उच्च तकनीक के जरिये बिना टांकों की सर्जरी होनी थी, इसके लिए तत्कालीन सर्जन डॉ. आशुतोष को जयपुर में ट्रेनिंग भी दिलाई गई थी। ट्रेनिंग पर एक लाख रुपये खर्च भी आया था लेकिन उनके जाने के बाद फिर किसी डॉक्टरों को ट्रेनिंग नहीं दी गई। जिन मरीजों को बिना चीरे वाले सर्जरी कराने होती है, उन्हें करनाल स्थित कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज, खानपुर मेडिकल कॉलेज या निजी अस्पतालों में जाना होता है।
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यह है फेको मशीन से मोतियाबिंद के ऑपरेशन का फायदा
फेको मशीन से मोतियाबिंद का उपचार के लिए बड़े चीरे की आवश्यकता नहीं होती हैं। आंख में महज 2.8 एमएम का बारीक छेद किया जाता है। मशीन के माध्यम से मोतिया को आंख के अंदर ही घोल दिया जाता है। मशीन के जरिये ही फोल्डेबल लेंस को आंख के अंदर प्रत्यारोपित कर देते हैं। इसे माइक्रो फेको तकनीक कहते हैं। कोई इंजेक्शन नहीं लगाया जाता, दवा की कुछ बूंद डाली जाती हैं। ऑपरेशन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बिना दर्द हुए इस आपरेशन के बाद मरीज को आंखों पर पट्टी भी बांधनी नहीं पड़ती हैं।
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मशीन को ठीक कराने के प्रयास भी धीमे
सिविल सर्जन ने इस मशीन को दोबारा ठीक कराकर फेको सर्जरी के प्रयास शुरू किए थे। इस संबंध में डिप्टी सिविल सर्जन को निर्देश भी दिए गए थे। मशीन को चेक करने के लिए दिल्ली के इंजीनियर आने थे, लेकिन हुआ कुछ नहीं। एक माह बाद भी मशीन की जांच नहीं हो पाई है।
वर्जन:
डॉक्टरों की ट्रेनिंग के लिए लिखा गया पत्र : सिविल सर्जन
फेको मशीन की जांच कराई जाएगी। मशीन अगर खराब है तो उसे ठीक कराया जाएगा। डॉक्टरों के प्रशिक्षण के लिए मुख्यालय में पत्र लिखा गया है। उनका प्रयास है कि जल्द डॉक्टरों को प्रशिक्षण दिलाकर यहां फेको मशीन से सर्जरी शुरू हो।
- डॉ. जयंत आहूजा, सिविल सर्जन पानीपत।