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Panipat News: देवी मां के दर्शन को उमड़े श्रद्धालु
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पानीपत। शारदीय नवरात्र पर इस बार एक नवरात्र बढ़ने पर रविवार को मां के तीसरे रूप पर चंद्रघंटा का पूजन किया गया। प्राचीन देवी मंदिर में रविवार की छुट्टी के चलते सुबह व शाम के समय भक्तों का माता के दर्शनों के लिए तांता लगा रहा। मंदिर में शाम के समय पैर रखने को भी जगह नहीं बची थी। इन सबके चलते मंदिर प्रबंधन को सुरक्षा और व्यवस्था के लिए अतिरिक्त प्रबंध किए। भक्तों को दर्शनों के लिए पूरा समय दिया गया।
उल्लेखनीय है कि नवरात्र पर्व पर लोगों ने घरों व मंदिर में मां दुर्गा का पूजन किया। भक्तों ने मां चंद्रघंटा को अपनी प्रार्थना की और इनको पूरा करने की मन्नत मांगी। देवी मंदिर के आचार्य लालमणि पांडेय ने बताया कि दैत्यों का आतंक बढ़ने लगा था। उस समय महिषासुर का भयंकर युद्ध देवताओं से चल रहा था। महिषासुर स्वर्गलोक पर राज करना चाहता था। इसी सोच के साथ इंद्र का सिंहासन प्राप्त करने के लिए युद्ध कर रहा था। देवताओं को उसकी इस मंशा का पता चला तो वे भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए। देवताओं की व्यथा सुनकर उनको क्रोध हो गया। जिससे उनके मुख से ऊर्जा निकली। इस ऊर्जा से एक देवी प्रकट हुईं। जिनका नाम मां चंद्रघंटा पड़ा। उनको भगवान शंकर ने अपना त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र, इंद्र ने घंटा, सूर्य ने तेज और तलवार और सिंह प्रदान किया। मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का वध कर देवताओं की रक्षा की। तब से माता के इस रूप की विशेष पूजा की जाती है। यह दुश्मनों पर जीत पाने की कामना से की जाती है।
मंदिर में शाम को पहुंचे ज्यादा भक्त
प्राचीन देवी मंदिर में अल सुबह पूजन व आरती के साथ कपाट दर्शनों के लिए खोल दिए गए थे। रविवार की छुट्टी के चलते सुबह के समय अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा भक्त पहुंचे। यहां दोपहर 12 बजे तक दर्शन किए। इसके बाद साफ सफाई और व्यवस्था बनाने के लिए दोपहर के समय कुछ देर मंदिर बंद रखा। शाम को चार बजे फिर से कपाट खोले गए। शुरुआती घंटे में कम पहुंचे। लेकिन शाम को भक्तों का रेला एक साथ पहुंच गया। देर शाम तक भक्तों का दर्शनों के लिए अना-जाना लगा रहा। तब माता दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का अवतार लिया था।
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उल्लेखनीय है कि नवरात्र पर्व पर लोगों ने घरों व मंदिर में मां दुर्गा का पूजन किया। भक्तों ने मां चंद्रघंटा को अपनी प्रार्थना की और इनको पूरा करने की मन्नत मांगी। देवी मंदिर के आचार्य लालमणि पांडेय ने बताया कि दैत्यों का आतंक बढ़ने लगा था। उस समय महिषासुर का भयंकर युद्ध देवताओं से चल रहा था। महिषासुर स्वर्गलोक पर राज करना चाहता था। इसी सोच के साथ इंद्र का सिंहासन प्राप्त करने के लिए युद्ध कर रहा था। देवताओं को उसकी इस मंशा का पता चला तो वे भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए। देवताओं की व्यथा सुनकर उनको क्रोध हो गया। जिससे उनके मुख से ऊर्जा निकली। इस ऊर्जा से एक देवी प्रकट हुईं। जिनका नाम मां चंद्रघंटा पड़ा। उनको भगवान शंकर ने अपना त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र, इंद्र ने घंटा, सूर्य ने तेज और तलवार और सिंह प्रदान किया। मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का वध कर देवताओं की रक्षा की। तब से माता के इस रूप की विशेष पूजा की जाती है। यह दुश्मनों पर जीत पाने की कामना से की जाती है।
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मंदिर में शाम को पहुंचे ज्यादा भक्त
प्राचीन देवी मंदिर में अल सुबह पूजन व आरती के साथ कपाट दर्शनों के लिए खोल दिए गए थे। रविवार की छुट्टी के चलते सुबह के समय अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा भक्त पहुंचे। यहां दोपहर 12 बजे तक दर्शन किए। इसके बाद साफ सफाई और व्यवस्था बनाने के लिए दोपहर के समय कुछ देर मंदिर बंद रखा। शाम को चार बजे फिर से कपाट खोले गए। शुरुआती घंटे में कम पहुंचे। लेकिन शाम को भक्तों का रेला एक साथ पहुंच गया। देर शाम तक भक्तों का दर्शनों के लिए अना-जाना लगा रहा। तब माता दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का अवतार लिया था।
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