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गणेश जी के प्रथम पूजन से मनोकामनाएं होती है पूरी : गणेशानंद मिश्रा
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माई सिटी रिपोर्टर
पंचकूला। सेक्टर-15 स्थित श्री रघुनाथ मंदिर में श्री शिव महापुराण कथा में शनिवार को भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़े। कथा में कथाव्यास गणेशानंद मिश्रा ने भगवान गणेश के प्रथम पूजन का महत्व बताया। भगवान गणेश ने माता पार्वती और पिता श्री शिव की परिक्रमा करके दुनिया में प्रथम पूजन का सौभाग्य प्राप्त किया था। उन्होंने कहा कि लोगों को अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव और शक्ति के विवाह का वर्णन किया।
उसके बाद शिव-शक्ति के दो पुत्रों की उत्पति की कथा सुनाई। उन्होेंने बताया कि माता शक्ति ने स्नान करते समय अपने उबटन से एक सुंदर बालक का निर्माण कर उसमें अपनी शक्ति से प्राण डाल दिए। उन्होंने अपने इस पुत्र का नाम गणेश रखा और आदेश दिए कि जब तक नहाकर बाहर नहीं आऊं, कोई अंदर न आए। गणेश जी पहरा दे रहे थे, तो भगवान शिव आए और अंदर जाने लगे परंतु गणेश जी ने उनको रोक दिया। शिव ने अपने गणों को उन्हें हटाने की आज्ञा दी, परंतु वे भगवान गणेश जी से हारकर भाग गए।
भगवान शिव ने क्रोध में बालक गणेश का सिर अपने त्रिशूल से काट दिया। जब माता को इस बात का पता चला तो उन्होंने चंडी का विकराल रूप धारण कर लिया। सभी देवताओं ने घबराकर माता की स्तुति की और भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे बालक को जीवन दें। उन्होंने हाथी का सिर लगाकर गणेश को जीवंत कर दिया।
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पंचकूला। सेक्टर-15 स्थित श्री रघुनाथ मंदिर में श्री शिव महापुराण कथा में शनिवार को भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़े। कथा में कथाव्यास गणेशानंद मिश्रा ने भगवान गणेश के प्रथम पूजन का महत्व बताया। भगवान गणेश ने माता पार्वती और पिता श्री शिव की परिक्रमा करके दुनिया में प्रथम पूजन का सौभाग्य प्राप्त किया था। उन्होंने कहा कि लोगों को अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव और शक्ति के विवाह का वर्णन किया।
उसके बाद शिव-शक्ति के दो पुत्रों की उत्पति की कथा सुनाई। उन्होेंने बताया कि माता शक्ति ने स्नान करते समय अपने उबटन से एक सुंदर बालक का निर्माण कर उसमें अपनी शक्ति से प्राण डाल दिए। उन्होंने अपने इस पुत्र का नाम गणेश रखा और आदेश दिए कि जब तक नहाकर बाहर नहीं आऊं, कोई अंदर न आए। गणेश जी पहरा दे रहे थे, तो भगवान शिव आए और अंदर जाने लगे परंतु गणेश जी ने उनको रोक दिया। शिव ने अपने गणों को उन्हें हटाने की आज्ञा दी, परंतु वे भगवान गणेश जी से हारकर भाग गए।
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भगवान शिव ने क्रोध में बालक गणेश का सिर अपने त्रिशूल से काट दिया। जब माता को इस बात का पता चला तो उन्होंने चंडी का विकराल रूप धारण कर लिया। सभी देवताओं ने घबराकर माता की स्तुति की और भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे बालक को जीवन दें। उन्होंने हाथी का सिर लगाकर गणेश को जीवंत कर दिया।
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