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हरियाणा में गन्ने की फसल में चोटी बेधक बीमारी की दस्तक
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गन्ने की फसल में चोटी बेधक बीमारी का सर्वे करने पहुंची टीम।
चंडीगढ़। हरियाणा में गन्ने की फसल में टॉप बेरर (चोटी बेधक) बीमारी ने दस्तक देे दी है। इससे किसान और विभाग दोनों अलर्ट हो गए हैं। कृषि विभाग ने इसको लेकर अलग-अलग जिलों में सर्वे भी कराया है। करनाल, कैथल, कुरुक्षेत्र और यमुनानगर में इसका अधिक प्रभाव है, जबकि जींद, रोहतक और झज्जर में कम है। खास बात ये है कि सीओ 238 किस्म में बीमारी अधिक है, जबकि सीओएच-160 और सीओ 239 में यह कम है। स्थिति को देखते हुए कृृषि विभाग ने किसानों के लिए एडवाइजरी भी जारी कर दी है। साथ ही सभी जिला कृषि अधिकारियों को भी किसानों के बीच जाकर जागरूक करने को कहा है।
हरियाणा में इस बार 110 लाख हेक्टेयर में गन्ना की बिजाई की गई है। कृषि विभाग की एसीएस सुमिता मिश्रा के आदेश पर कृषि विभाग ने जिलों में बीमारी को लेकर सर्वे किया है। एसी स्टेंट कैन कमिश्नर डॉ. रविंद्र हुड्डा और डिप्टी कैन कमिश्नर डॉ. पवन शर्मा ने करनाल, कैथल, यमुनानगर, अंबाला समेत अन्य जिलों का सर्वे किया है। डा. हुड्डा ने बताया कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है।
उत्पादन को करती है प्रभावित
यह बीमारी अप्रैल-मई में शुरू होती है और अक्तूबर तक रहती है। इसमें कीट पत्तियों की गोभ में चला जाता है। फैलते हुए यह अगोले (हरा चारा) तक पहुंच जाता है और गन्ने की पोरियों की आंखों को क्षतिग्रस्त कर देता है। कुल मिलाकर इसका गन्ने की उत्पादन, गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है और अगोला कम होता है। अगर समय पर इस बीमारी को नियंत्रित नहीं किया जाए तो इससे 50 से 60 प्रतिशत तक उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
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शुगर की मात्रा अधिक होने से आती है बीमारी
वैज्ञानिकों का कहना है कि सीओ-238 किस्म में शुगर की मात्रा काफी अधिक होती है, जो कीट को आकर्षित करती है। इसके अलावा, नाइट्रोजन का अधिक इस्तेमाल भी इसका एक कारण है। इसलिए अब विभाग की ओर से किसानों को इस किस्म के कम लगाने पर जोर दिया जा रहा है। फसल में प्रोफेनोफास और साइपरथरीन का प्रयोग करें। परवीजी ट्राइकोग्रामा जापोनिकम से भी कीट को खत्म किया जा सकता है।
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हरियाणा में इस बार 110 लाख हेक्टेयर में गन्ना की बिजाई की गई है। कृषि विभाग की एसीएस सुमिता मिश्रा के आदेश पर कृषि विभाग ने जिलों में बीमारी को लेकर सर्वे किया है। एसी स्टेंट कैन कमिश्नर डॉ. रविंद्र हुड्डा और डिप्टी कैन कमिश्नर डॉ. पवन शर्मा ने करनाल, कैथल, यमुनानगर, अंबाला समेत अन्य जिलों का सर्वे किया है। डा. हुड्डा ने बताया कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है।
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उत्पादन को करती है प्रभावित
यह बीमारी अप्रैल-मई में शुरू होती है और अक्तूबर तक रहती है। इसमें कीट पत्तियों की गोभ में चला जाता है। फैलते हुए यह अगोले (हरा चारा) तक पहुंच जाता है और गन्ने की पोरियों की आंखों को क्षतिग्रस्त कर देता है। कुल मिलाकर इसका गन्ने की उत्पादन, गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है और अगोला कम होता है। अगर समय पर इस बीमारी को नियंत्रित नहीं किया जाए तो इससे 50 से 60 प्रतिशत तक उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
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शुगर की मात्रा अधिक होने से आती है बीमारी
वैज्ञानिकों का कहना है कि सीओ-238 किस्म में शुगर की मात्रा काफी अधिक होती है, जो कीट को आकर्षित करती है। इसके अलावा, नाइट्रोजन का अधिक इस्तेमाल भी इसका एक कारण है। इसलिए अब विभाग की ओर से किसानों को इस किस्म के कम लगाने पर जोर दिया जा रहा है। फसल में प्रोफेनोफास और साइपरथरीन का प्रयोग करें। परवीजी ट्राइकोग्रामा जापोनिकम से भी कीट को खत्म किया जा सकता है।