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Panchkula News: भारत में शोर प्रदूषण से निपटने को विशेष एक्ट बनाने की जरूरत
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अमर उजाला ब्यूरो
पटियाला। पंजाबी यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में भारत में शोर प्रदूषण से संबंधित कानून का विश्लेषण किया गया है। कानून विभाग के शोधकर्ता डॉ. नवविंदर सिंह द्वारा प्रो. मोनिका चावला के मार्गदर्शन में किए गए इस अध्ययन में कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए हैं।शोधकर्ता डॉ. नवविंदर सिंह ने बताया कि अध्ययन से पता चला है कि संविधान के प्रावधानों और शोर प्रदूषण से संबंधित विशेष कानूनों में शोर के विरुद्ध अपराध की प्रकृति को स्पष्ट रूप से घोषित नहीं किया गया है और इस संबंध में अधिकार क्षेत्र की स्थिति भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि यह भी पता चला है कि संबंधित कानूनों के माध्यम से दी जा सकने वाली सजा भी अपर्याप्त है। उन्होंने कहा कि अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि इन कानूनों के साथ-साथ उचित उपाय भी किए जाने चाहिए और भारत में शोर प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए एक विशेष अधिनियम भी बनाया जाना चाहिए।
सरकारी विभागों और नीति निर्माताओं को सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन आदि जैसे स्रोतों के माध्यम से ध्वनि प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए नीति बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे कई और सुझाव सामने आए हैं जिन्हें कानून की दृष्टि से उचित ठहराया जा सकता है।
वीसी डॉ. जगदीप सिंह ने इस अध्ययन की सराहना करते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों और अन्य संबंधित शिक्षण संस्थानों द्वारा गुणवत्तापूर्ण अध्ययन के माध्यम से सामने लाए गए ऐसे ठोस सुझाव नीति निर्माण की प्रक्रिया में उपयोगी साबित होते हैं क्योंकि अच्छी नीतियां आम जनता के कल्याण के लिए आवश्यक हैं।
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पटियाला। पंजाबी यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में भारत में शोर प्रदूषण से संबंधित कानून का विश्लेषण किया गया है। कानून विभाग के शोधकर्ता डॉ. नवविंदर सिंह द्वारा प्रो. मोनिका चावला के मार्गदर्शन में किए गए इस अध्ययन में कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए हैं।शोधकर्ता डॉ. नवविंदर सिंह ने बताया कि अध्ययन से पता चला है कि संविधान के प्रावधानों और शोर प्रदूषण से संबंधित विशेष कानूनों में शोर के विरुद्ध अपराध की प्रकृति को स्पष्ट रूप से घोषित नहीं किया गया है और इस संबंध में अधिकार क्षेत्र की स्थिति भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि यह भी पता चला है कि संबंधित कानूनों के माध्यम से दी जा सकने वाली सजा भी अपर्याप्त है। उन्होंने कहा कि अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि इन कानूनों के साथ-साथ उचित उपाय भी किए जाने चाहिए और भारत में शोर प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए एक विशेष अधिनियम भी बनाया जाना चाहिए।
सरकारी विभागों और नीति निर्माताओं को सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन आदि जैसे स्रोतों के माध्यम से ध्वनि प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए नीति बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे कई और सुझाव सामने आए हैं जिन्हें कानून की दृष्टि से उचित ठहराया जा सकता है।
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वीसी डॉ. जगदीप सिंह ने इस अध्ययन की सराहना करते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों और अन्य संबंधित शिक्षण संस्थानों द्वारा गुणवत्तापूर्ण अध्ययन के माध्यम से सामने लाए गए ऐसे ठोस सुझाव नीति निर्माण की प्रक्रिया में उपयोगी साबित होते हैं क्योंकि अच्छी नीतियां आम जनता के कल्याण के लिए आवश्यक हैं।
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