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Panchkula News: पूर्व कार्यवाहक जत्थेदार गुरदेव सिंह काउंके की मौत का मामला पहुंचा हाईकोर्ट

Thu, 29 May 2025 12:07 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 29 May 2025 12:07 AM IST
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The case of the death of former acting Jathedar Gurdev Singh Kaunke reached the High Court
अमर उजाला ब्यूरो
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चंडीगढ़। पूर्व कार्यवाहक जत्थेदार गुरदेव सिंह काउंके की रहस्यमयी गिरफ्तारी और पुलिस हिरासत में कथित हत्या के 32 साल से अधिक समय बाद उनके बेटे ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए दोषियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पंजाब पुलिस को नोटिस जारी कर 28 जुलाई तक जवाब देने के निर्देश दिए हैं।

गुरदेव सिंह काउंके के 49 वर्षीय बेटे हरि सिंह सेखों ने हाईकोर्ट को बताया कि 1992 में उनके पिता लगभग 43 वर्ष के थे और वे सिख संगत को गुरबाणी का प्रचार किया करते थे। 20 दिसंबर 1992 को उनके पिता को तत्कालीन थाना प्रभारी जगराओं इंस्पेक्टर गुरमीत सिंह ने हिरासत में लिया था, लेकिन गांव के प्रतिष्ठित लोगों के हस्तक्षेप के बाद उन्हें छोड़ दिया गया। इसके बाद 25 दिसंबर 1992 को दोबारा 200 गांववासियों की उपस्थिति में उन्हें हिरासत में लिया। उन्हें अवैध रूप से पुलिस थाने या जगराओं की सीआईए स्टाफ बिल्डिंग में रखा गया, जहां उनके साथ बर्बरता से मारपीट की गई। 28 दिसंबर तक उनकी मां को पुलिस स्टेशन में जाने दिया गया। लेकिन इसके बाद उन्हें अंदर जाने से रोक दिया गया। इसके बाद 1993 में हाईकोर्ट ने वारंट अधिकारी हरि चंद को नियुक्त किया गया। जब वह जगरांव थाना पहुंचे तो वहां जत्थेदार कौंके से जुड़ी कोई जानकारी नहीं मिली। बाद में इंस्पेक्टर गुरमीत सिंह ने कहा कि काउंके पुलिस हिरासत से फरार हो गए हैं। इस आधार पर एक एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस ने परिवार को डराने के लिए याचिकाकर्ता को 6 दिसंबर 1995 को एफआईआर नंबर 133 के तहत हत्या के प्रयास और अन्य धाराओं में फंसाया, लेकिन अदालत ने उन्हें आरोपमुक्त कर दिया।
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पंजाब सरकार द्वारा कराई गई जांच के दौरान तत्कालीन एडीजीपी (सुरक्षा) बीपी तिवारी ने कई गवाहों के बयान दर्ज किए। जांच में सामने आया कि काउंके को पुलिस ने उनके घर से अवैध हिरासत में लिया और बर्बरता की। 28 दिसंबर 1992 के बाद उन्हें किसी ने जीवित नहीं देखा। तिवारी ने रिपोर्ट में फरार होने की कहानी को अविश्वसनीय बताते हुए पुलिस पर कार्रवाई की सिफारिश की। यह रिपोर्ट डीजीपी ने मंजूर नहीं की और ऐसे में अब 32 साल बाद, उनके बेटे ने हाईकोर्ट की शरण ली है।
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