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Panchkula News: भाई-बहन के रिश्ते के साथ पर्यावरण में प्यार घोलने आ गई राखियां

Sun, 11 Aug 2024 02:33 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 11 Aug 2024 02:33 AM IST
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Rakhis have come to spread love in the environment with brother-sister relationship
50 से 100 रुपये में बिक रहीं, राखियां, पर्यावरण के लिए हैं फायदेमंद
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राखियों को इस्तेमाल करने के बाद इन्हें गमलों में डालने पर उगेंगे पौधे
संवाद न्यूज एजेंसी
पंचकूला। भाई-बहन के बीच अटूट बंधन का पर्व रक्षाबंधन नजदीक है। बाजार में अलग-अलग तरह की राखियां बिकनी शुरू हो गई हैं। बाजार में इस बार किचन कंसेप्ट पर मिट्टी से बनी राखियों की की भी खूब डिमांड है।
मिट्टी की राखियों में मैथी, सौंफ, अजवाइन और अन्य उपयोगी बीजों को डाला गया है। इन राखियों को इस्तेमाल करने के बाद इन्हें गमलों में डालते ही पौधे उग जाएंगे। यह राखियां पूरी तरह से इको फ्रेंडली हैं यानी कि पर्यावरण को नुकसान से बचाएंगी।
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राखियों को बनाने वाली अमरजीत कौर ने बताया कि वह पिछले कई सालों से मिट्टी से बनी राखियों को बना रही हैं। इस बार उन्होंने किचन कंसेप्ट को ध्यान में रखकर अजवाइन, सौंफ मैथी सहित अन्य बीजों को राखियों में डाला है।
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प्लास्टिक की राखियों से पर्यावरण को नुकसान होता है और वे महंगी भी होती हैं। उन्हें इस्तेमाल करके फेंक दिया जाता है। मिट्टी से बनी राखियों को इस्तेमाल करने के बाद भी इनका इस्तेमाल हो जाता है। ये इस्तेमाल पर्यावरण के लिए तो फायदेमंद होगा ही, मानव जीवन को भी सुखकर बनाएगा।
50 से 100 रुपये में बिक रही राखियां
अमरजीत कौर ने बताया कि वह इन राखियों को घर पर तैयार करती हैं। मिट्टी से बनी राखियां 50 से 100 रुपये तक में बेची जा रही हैं। इन राखियों को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बेचा जा रहा है। हर साल इन्हें खरीदने का क्रेज बढ़ता जा रहा है।

पापा को देखकर सीखा काम
अमरजीत कौर ने बताया कि उनके पापा रामजी दास प्रजापति मिट्टी से बने सामान बनाते हैं और शहर में बेचते हैं। उन्होंने अपने पापा के बिजनेस को आगे बढ़ाने को सोचा और मिट्टी के प्रोडक्ट बनाने शुरू कर दिए। क्योंकि, ये पर्यावरण के लिए लाभदायक होते हैं।

उन्होंने बताया कि उनका मकसद है कि प्लास्टिक का कम इस्तेमाल किया जाए और मिट्टी से बने उत्पादों का इस्तेमाल ज्यादा किया जाए। पुराने समय में मिट्टी के सामानों का इस्तेमाल ज्यादा किया जाता था।
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