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Panchkula News: डीएपी खाद की कमी से जूझ रहा पंजाब, आपूर्ति की मांग पर केंद्र को नोटिस
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चंडीगढ़। गेहूं की फसल के अंकुरण और विकास के लिए महत्वपूर्ण डायमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) उर्वरक की कमी के चलते उपज को लेकर पैदा हुए संकट के मामले में दाखिल जनहित याचिका पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने केंद्र व पंजाब सरकार सहित अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। याचिका दाखिल करते हुए एडवोकेट फतेह सिंह ढिल्लों ने हाईकोर्ट को बताया कि पंजाब में रबी की फसल को अक्टूबर के अंत से नवंबर के मध्य तक बोया जाना है। डीएपी की पर्याप्त आपूर्ति के बिना भारत के खाद्यान्न भंडार में प्रमुख योगदान देने वाले पंजाब में गेहूं की पैदावार में काफी कमी आएगी। इसका उन किसानों पर सबसे ज्यादा असर होगा जो अपनी आजीविका के लिए उच्च उत्पादकता पर निर्भर हैं।
याचिका में उर्वरक की कमी के आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं, जिसमें बताया गया है कि राज्य को रबी सीजन के लिए लगभग 5.50 लाख मीट्रिक टन डीएपी की आवश्यकता है, लेकिन अब तक केवल 1.10 लाख मीट्रिक टन ही आवंटित की गई है। याची ने बताया कि पंजाब का कृषि क्षेत्र जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में लगभग 24% का योगदान देता है, भारत के केंद्रीय पूल योगदान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। डीएपी की कमी के कारण पंजाब को गंभीर वित्तीय और रसद चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति एक संवेदनशील कानून-व्यवस्था वाले सीमावर्ती राज्य में कृषि में कोई भी व्यवधान किसान अशांति को बढ़ा सकता है, जो संभावित रूप से सार्वजनिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
याचिका में आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 का भी संदर्भ दिया गया है, जो केंद्र सरकार को उर्वरक आपूर्ति को विनियमित करने का अधिकार देता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि डीएपी की कमी न केवल राज्य की आर्थिक स्थिरता बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा को भी खतरे में डालती है, यह देखते हुए कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए गेहूं का एक बड़ा हिस्सा पंजाब से आता है। याचिका में संबंधित अधिकारियों को पंजाब को समय पर और पर्याप्त डीएपी आवंटन सुनिश्चित करने और किसानों की आजीविका को संरक्षित करने का निर्देश जारी करने की अपील की गई।
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याचिका में उर्वरक की कमी के आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं, जिसमें बताया गया है कि राज्य को रबी सीजन के लिए लगभग 5.50 लाख मीट्रिक टन डीएपी की आवश्यकता है, लेकिन अब तक केवल 1.10 लाख मीट्रिक टन ही आवंटित की गई है। याची ने बताया कि पंजाब का कृषि क्षेत्र जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में लगभग 24% का योगदान देता है, भारत के केंद्रीय पूल योगदान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। डीएपी की कमी के कारण पंजाब को गंभीर वित्तीय और रसद चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति एक संवेदनशील कानून-व्यवस्था वाले सीमावर्ती राज्य में कृषि में कोई भी व्यवधान किसान अशांति को बढ़ा सकता है, जो संभावित रूप से सार्वजनिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
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याचिका में आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 का भी संदर्भ दिया गया है, जो केंद्र सरकार को उर्वरक आपूर्ति को विनियमित करने का अधिकार देता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि डीएपी की कमी न केवल राज्य की आर्थिक स्थिरता बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा को भी खतरे में डालती है, यह देखते हुए कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए गेहूं का एक बड़ा हिस्सा पंजाब से आता है। याचिका में संबंधित अधिकारियों को पंजाब को समय पर और पर्याप्त डीएपी आवंटन सुनिश्चित करने और किसानों की आजीविका को संरक्षित करने का निर्देश जारी करने की अपील की गई।
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