पंचकूला स्कूल कांड: बेटी के दर्द ने सरकारी स्कूल से उठाया पिता का भरोसा, अब बेटियां जाएंगी बड़े निजी स्कूल
पंचकूला के एक सरकारी स्कूल में 29 अक्तूबर को हुए हमले के बाद बच्ची को आधी रात पीजीआई के एडवांस ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया था। सिर और चेहरे पर गंभीर चोटों के कारण उसकी हालत नाजुक थी। वह करीब 40 घंटे बेहोश रही। डॉक्टरों की लगातार निगरानी और उपचार के बाद हालत में सुधार हुआ और बुधवार को उसे छुट्टी दे दी गई।
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पंचकूला के स्कूल में छह साल की बेटी पर हुए जानलेवा हमले ने पिता का सरकारी स्कूल से भरोसा उठा दिया है। बुधवार को पीजीआई से छुट्टी मिलने के बाद बेटी घर लौटी तो पिता ने साफ कहा कि अब अपनी दोनों बेटियों को इस स्कूल में नहीं पढ़ाएंगे। उन्हें किसी बड़े निजी स्कूल में दाखिला दिलाएंगे। बेटी बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती है और पिता उसका यह सपना हर हाल में पूरा करना चाहते हैं।
बुधवार सुबह करीब 11:30 बजे पीजीआई के एडवांस ट्रॉमा सेंटर से बाहर निकली बच्ची के एक हाथ में गुड़िया थी और चेहरे पर हल्की मुस्कान। कमजोरी के कारण वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। पिता की गोद में सिमटी बच्ची घर जाने को उत्साहित थी। जाते समय उसने पीजीआई निदेशक प्रो. विवेक लाल और डॉक्टरों को थैंक्यू कहा। सुरक्षा कर्मियों से भी हाथ मिलाकर विदा ली। निदेशक ने पूरी टीम के साथ बच्ची से मुलाकात कर उसे शुभकामनाएं दीं। इसके बाद वह माता-पिता के साथ अपने चाचा के घर पहुंची। घर की सीढ़ियां फूलों से सजाई गई थीं। रिश्तेदारों ने फूलों और गुब्बारों से उसका स्वागत किया।
बड़ी बहन भी सदमे में, घर में छह दिन नहीं गूंजी हंसी
पिता ने बताया कि बड़ी बेटी भी इसी स्कूल में दूसरी कक्षा में पढ़ती है। घटना वाले दिन घर पहुंचकर उसने कहा था...पापा, आज दीदी नहीं मिली, वह मुझसे नहीं मिली। छोटी बहन पर हमले की जानकारी के बाद वह गुमसुम रहने लगी और खाना-पीना भी छोड़ दिया। छह दिन तक घर में दोनों बहनों की हंसी गायब रही। बुधवार को छोटी बहन घर पहुंची तो बड़ी बहन दौड़कर उससे लिपट गई।
बच्ची अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं है। उसे चक्कर आते हैं और पैरों में दर्द रहता है। डॉक्टरों ने 10 दिन बाद फॉलोअप के लिए बुलाया है। किसी भी परेशानी पर परिवार पीजीआई आ सकता है। संस्थान ने आगे भी जरूरी चिकित्सा देखभाल का भरोसा दिया है। माता-पिता ने कहा कि पूरे देश के लोगों की दुआओं ने उनकी बेटी को नई जिंदगी दी है।
बच्ची से मिलीं महिला आयोग अध्यक्ष, बोलीं- लापरवाही के दोषी नहीं बचेंगे
बुधवार सुबह घर लौटी छह वर्षीय पीड़ित बच्ची से हरियाणा राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष उषा प्रियदर्शनी ने मुलाकात की। उन्होंने करीब आधा घंटा बच्ची के साथ बिताया, गोद में लेकर दुलारा और परिवार को हरसंभव मदद का भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि स्कूल की लापरवाही पर शिक्षा विभाग को पत्र लिखेंगी और जल्द निरीक्षण करेंगी। दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी। सदमे में चल रही बच्ची की आयोग सप्ताह में तीन से चार दिन नियमित काउंसलिंग कराएगा, ताकि वह सामान्य जीवन में लौट सके।
छह वर्षीय छात्रा पर हमले के आरोपी आठ वर्षीय बच्चे को जीएमसीएच-32 की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट में कंडक्ट डिसऑर्डर (व्यवहार संबंधी विकार) सामने आने के बाद माता-पिता के पास भेजा गया है।
विशेषज्ञों के आकलन के अनुसार, इस उम्र में बच्चे को सुधारने के लिए पारिवारिक माहौल, अभिभावकों की निगरानी और नियमित काउंसलिंग जरूरी है। इसी आधार पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) ने उसकी कस्टडी माता-पिता को सौंपी। इससे पहले उसे पांच दिन अंबाला के ऑब्जर्वेशन होम में रखा गया था। अब उसी स्कूल में उसकी वापसी होगी या नहीं, इसका फैसला शिक्षा विभाग और सरकार करेंगे।
जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी (डीईईओ) सुमन चौधरी ने बताया कि स्कूल में वापसी से पहले बच्चे की काउंसलिंग कराई जाएगी। उसके व्यवहार और मानसिक स्थिति का आकलन होगा। जरूरत पड़ने पर दवा को लेकर विशेषज्ञों की राय भी ली जाएगी। अंतिम निर्णय मामले की रिपोर्ट और सरकार के निर्देशों के आधार पर होगा।
बेटे को उसी स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं पिता
बच्चे के पिता का कहना है कि शिक्षा उनके बेटे का मौलिक अधिकार है। वह चाहते हैं कि बेटा उसी स्कूल में पढ़ाई जारी रखे। उनके अनुसार, स्कूल अच्छा है और घटना के बाद दूसरे स्कूल में दाखिला मिलना भी आसान नहीं होगा।
कंडक्ट डिसऑर्डर के प्रमुख लक्षण
- आक्रामकता : दूसरे बच्चों से मारपीट और धमकाना।
- असंवेदनशीलता : दूसरों की भावनाओं और तकलीफ की परवाह न करना।
- नियमों का उल्लंघन : बार-बार अनुशासनहीनता।
- झूठ और चोरी : धोखा देना और बार-बार झूठ बोलना।
- तोड़फोड़ : जानबूझकर संपत्ति को नुकसान पहुंचाना।
- पछतावे की कमी : दूसरों को पहुंचाए नुकसान पर अपराधबोध न होना।
माता-पिता की जिम्मेदारी बढ़ी
जेजेबी ने बच्चे की कस्टडी माता-पिता को सौंपी है लेकिन मामला समाप्त नहीं हुआ है। उन्हें बच्चे की गतिविधियों पर नजर रखने, नियमित काउंसलिंग कराने और निगरानी रिपोर्ट बोर्ड के सामने पेश करने के निर्देश दिए गए हैं। ऑब्जर्वेशन होम में पांच दिन की अवधि अस्थायी देखरेख के लिए थी, सजा के तौर पर नहीं। जेजे एक्ट में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए अलग प्रक्रिया है। बच्चे के व्यवहार में सुधार के लिए पारिवारिक सहयोग और विशेषज्ञों की मदद अहम होगी।