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Panchkula News: एयरफोर्स स्टेशन हलवारा की जगह खेतों और नहर में बम गिराता रहा पाकिस्तान
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हलवारा। पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम हो चुका है और हमेशा की तरह अपनी सेना को दुनिया की श्रेष्ठ सेना बताने वाले पड़ोसी मुल्क के बम और मिसाइल पहली बार निशाने से नहीं चूके बल्कि 1965 और 71 की जंग में भी वायुसेना स्थल हलवारा की हवाई पट्टी उड़ाने के लिए फेंके सभी बम आसपास गांव के खेतों में गिरते रहे।
हलवारा वायु सेना स्थल से सटकर गुजरती अबोहर ब्रांच नहर को वायु सेना स्थल की हवाई पट्टी समझ पानी में भी बमबारी करता रहा लेकिन एक भी निशाना सही नहीं लगा। हलवारा से उडे़ लड़ाकू विमानों के जांबाज पायलट्स ने पाकिस्तान से हमला करने आए सभी लड़ाकू विमानों को मार गिराया। 1965 की जंग में पाकिस्तान एयरफोर्स ने अपने सी-130 विमान से एलीट स्पेशल सर्विस ग्रुप के 180 कमांडों को हलवारा आदमपुर और पठानकोट एयरबेस को नुकसान पहुंचाने के मकसद से उतारा था। इन्हें किसानों, गांववासियों और एनसीसी कैडेट्स ने ही कई जगहों पर पकड़ बुरी तरह पीट सेना के हवाले कर दिया था।
1971 की जंग में हलवारा वायु सेना स्थल पर हमले के लिए उतरे कमांडो पैराट्रूपर्स गन्ने के खेतों में उतर गए। इनमें से एक को तो एतिआणा गांववासी जांबाज चरवाहे ने लोहे की बाल्टी से सिर पर कई वार करके अधमरा कर दिया, बाद में सेना के हवाले कर दिया था। 1965 में भेजे गए 180 पाकिस्तानी पैराट्रूपर्स कमांडों में से 132 को प्रिसनर्स ऑफ वार बनाया गया 32 मारे गए और बाकी पाकिस्तान भागने में सफल रहे थे। सराभा गांव के बुजुर्ग चरणजीत सिंह ग्रेवाल और जगधूड़ सिंह के अनुसार 1965 और 1971 की जंग में हलवारा से सटे सराभा और आसपास गांव में पाकिस्तान ने भारी बमबारी की लेकिन एक भी बम वायुसेना की हवाई पट्टी को नुकसान नहीं पहुंचा सका। गांववासियों ने सेना को सूचित किया जिसके बाद अधिकतर बम नष्ट कर दिए गए और दो बम जमीन के बहुत नीचे धंस गए जिन्हें निकाला नहीं गया जो आज भी सराभा के खेतों में दबे पड़े हैं।
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सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण भारतीय वायु सेना केंद्र हलवारा ने 1965 और 1971 की जंग के साथ साथ 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भी पाकिस्तान को धूल चटाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। कारगिल युद्ध के दौरान हलवारा देश का पहला वायुसेना स्थल था जहां से उडे़ मिग-23 लड़ाकू विमानों ने ऊंची चोटियों पर प्रहार करके दुश्मन के पैर उखाड़ दिए थे। कारगिल युद्ध के बाद मिग-23 लड़ाकू विमान को वायुसेना के बेड़े से हटाने और ग्राउंडेड घोषित करने के बाद हलवारा में सुपरसोनिक लड़ाकू विमान सुखोई-30 एम के आई का स्क्वाड्रन स्थापित कर दिया गया। 1962 की जंग में बेशक चीन के खिलाफ हलवारा स्टेशन ने जंग में सीधे भागीदारी नहीं की और न ही लड़ाकू विमानों ने चीन पर हमले किए लेकिन खूफिया जानकारी जुटाने और रसद सहायता पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी। घायल सैनिकों को एयरलिफ्ट करके अस्पताल पहुंचाने और रसद भेजने के लिए हलवारा से वायु सेना के हेलिकाॅप्टर और अन्य परिवहन बेड़े लगातार उड़ाने भरते रहे थे। 1965 की जंग में भारतीय वायुसेना केंद्र हलवारा ने अपने हंटर और 1971 में सुखोई -7 लड़ाकू विमान से पाकिस्तान के हर हमले को नाकाम करते हुए पीएएफ के लड़ाकू विमानों को मार गिराया था।
भारतीय वायु सेना स्थल हलवारा का देश की रक्षा में अहम योगदान
ब्रिटिश हुकूमत के दौरान 1942 में हलवारा में बनाए गए रॉयल एयर फोर्स एयरफील्ड को अंग्रेजों ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद बंद कर दिया था। आजादी के बाद इसके भाैगोलिक महत्व को समझते हुए भारत सरकार ने 16 मार्च 1950 को हलवारा में इसे दोबारा स्थापित करते हुए पहले 306 विंग और बाद में 9 विंग एयर फोर्स स्टेशन हलवारा का नाम दिया गया। शांति और युद्ध दोनों ही स्थिति में भारतीय वायु सेना स्थल हलवारा का देश की रक्षा में अहम योगदान है। हलवारा में स्थित वॉर मेमोरियल इसकी जीती जागती उदाहरण है। देश के सबसे पुराने और मौजूदा समय में विश्व विख्यात सुखोई -30 एम के आई सुपरसोनिक लड़ाकू विमानों के बेस एयरफोर्स स्टेशन हलवारा में 220 स्क्वाड्रन जिसे डेजर्ट टाइगर्स और 221 स्क्वाड्रन वेलिएंट्स के नाम से जाना जाता है।
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हलवारा वायु सेना स्थल से सटकर गुजरती अबोहर ब्रांच नहर को वायु सेना स्थल की हवाई पट्टी समझ पानी में भी बमबारी करता रहा लेकिन एक भी निशाना सही नहीं लगा। हलवारा से उडे़ लड़ाकू विमानों के जांबाज पायलट्स ने पाकिस्तान से हमला करने आए सभी लड़ाकू विमानों को मार गिराया। 1965 की जंग में पाकिस्तान एयरफोर्स ने अपने सी-130 विमान से एलीट स्पेशल सर्विस ग्रुप के 180 कमांडों को हलवारा आदमपुर और पठानकोट एयरबेस को नुकसान पहुंचाने के मकसद से उतारा था। इन्हें किसानों, गांववासियों और एनसीसी कैडेट्स ने ही कई जगहों पर पकड़ बुरी तरह पीट सेना के हवाले कर दिया था।
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1971 की जंग में हलवारा वायु सेना स्थल पर हमले के लिए उतरे कमांडो पैराट्रूपर्स गन्ने के खेतों में उतर गए। इनमें से एक को तो एतिआणा गांववासी जांबाज चरवाहे ने लोहे की बाल्टी से सिर पर कई वार करके अधमरा कर दिया, बाद में सेना के हवाले कर दिया था। 1965 में भेजे गए 180 पाकिस्तानी पैराट्रूपर्स कमांडों में से 132 को प्रिसनर्स ऑफ वार बनाया गया 32 मारे गए और बाकी पाकिस्तान भागने में सफल रहे थे। सराभा गांव के बुजुर्ग चरणजीत सिंह ग्रेवाल और जगधूड़ सिंह के अनुसार 1965 और 1971 की जंग में हलवारा से सटे सराभा और आसपास गांव में पाकिस्तान ने भारी बमबारी की लेकिन एक भी बम वायुसेना की हवाई पट्टी को नुकसान नहीं पहुंचा सका। गांववासियों ने सेना को सूचित किया जिसके बाद अधिकतर बम नष्ट कर दिए गए और दो बम जमीन के बहुत नीचे धंस गए जिन्हें निकाला नहीं गया जो आज भी सराभा के खेतों में दबे पड़े हैं।
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सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण भारतीय वायु सेना केंद्र हलवारा ने 1965 और 1971 की जंग के साथ साथ 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भी पाकिस्तान को धूल चटाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। कारगिल युद्ध के दौरान हलवारा देश का पहला वायुसेना स्थल था जहां से उडे़ मिग-23 लड़ाकू विमानों ने ऊंची चोटियों पर प्रहार करके दुश्मन के पैर उखाड़ दिए थे। कारगिल युद्ध के बाद मिग-23 लड़ाकू विमान को वायुसेना के बेड़े से हटाने और ग्राउंडेड घोषित करने के बाद हलवारा में सुपरसोनिक लड़ाकू विमान सुखोई-30 एम के आई का स्क्वाड्रन स्थापित कर दिया गया। 1962 की जंग में बेशक चीन के खिलाफ हलवारा स्टेशन ने जंग में सीधे भागीदारी नहीं की और न ही लड़ाकू विमानों ने चीन पर हमले किए लेकिन खूफिया जानकारी जुटाने और रसद सहायता पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी। घायल सैनिकों को एयरलिफ्ट करके अस्पताल पहुंचाने और रसद भेजने के लिए हलवारा से वायु सेना के हेलिकाॅप्टर और अन्य परिवहन बेड़े लगातार उड़ाने भरते रहे थे। 1965 की जंग में भारतीय वायुसेना केंद्र हलवारा ने अपने हंटर और 1971 में सुखोई -7 लड़ाकू विमान से पाकिस्तान के हर हमले को नाकाम करते हुए पीएएफ के लड़ाकू विमानों को मार गिराया था।
भारतीय वायु सेना स्थल हलवारा का देश की रक्षा में अहम योगदान
ब्रिटिश हुकूमत के दौरान 1942 में हलवारा में बनाए गए रॉयल एयर फोर्स एयरफील्ड को अंग्रेजों ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद बंद कर दिया था। आजादी के बाद इसके भाैगोलिक महत्व को समझते हुए भारत सरकार ने 16 मार्च 1950 को हलवारा में इसे दोबारा स्थापित करते हुए पहले 306 विंग और बाद में 9 विंग एयर फोर्स स्टेशन हलवारा का नाम दिया गया। शांति और युद्ध दोनों ही स्थिति में भारतीय वायु सेना स्थल हलवारा का देश की रक्षा में अहम योगदान है। हलवारा में स्थित वॉर मेमोरियल इसकी जीती जागती उदाहरण है। देश के सबसे पुराने और मौजूदा समय में विश्व विख्यात सुखोई -30 एम के आई सुपरसोनिक लड़ाकू विमानों के बेस एयरफोर्स स्टेशन हलवारा में 220 स्क्वाड्रन जिसे डेजर्ट टाइगर्स और 221 स्क्वाड्रन वेलिएंट्स के नाम से जाना जाता है।