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हाइड्रेल : कालका-शिमला नैरो गेज ट्रैक पर हाइड्रोजन ईंधन स्टेशन बनाने का काम शुरू
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माई सिटी रिपोर्टरपंचकूला। कालका-शिमला नैरो गेज ट्रैक पर दिसंबर 2023 से हाइड्रोजन ट्रेन हाइड्रेल चलाई जाएगी। बाद में इसका विस्तार अन्य स्थानों पर किया जाएगा। इसके आधारभूत संरचना से लेकर ट्रेनों के रैक पर करीब 870 करोड़ रुपये खर्च होगा। इसमें 70 करोड़ रुपये तीन स्टेशनों की आधारभूत संरचना और 800 करोड़ ट्रेनों के रैक के शामिल हैं। यह जानकारी रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शुक्रवार को वीडियो कांफ्रेंसिंग से दी। उन्होंने बताया कि कालका-शिमला रेल खंड पर हाइड्रोजन ट्रेन चलाने के लिए कालका, शिमला और बड़ोग स्टेशनों को हाइड्रोजन ईंधन स्टेशन के तौर पर विकसित किया जा रहा है। नवंबर में इसकी टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली गई थी। प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो गया है। देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन चलाने के लिए इन स्टेशनों का चयन किया गया है। इन स्टेशनों पर पानी से हाइड्रोजन निकाल कर ईंधन में बदलने के प्लांट लगेंगे।
एक कोच पर करीब 80 करोड़ रुपये खर्च आएगा, 10 कोच होंगे तैयार
अंबाला मंडल के डीआरएम एमएस भाटिया ने बताया कि मेक इन इंडिया योजना के तहत भारत के चेन्नई स्थित आईसीएफ (इंटीग्रल कोच फैक्ट्री) में हाइड्रोजन कोच को डिजाइन और निर्मित किया जाएगा। पहले चरण में दस कोच डिजाइन किए जाएंगे। एक हाइड्रोजन कोच के निर्माण पर करीब 80 करोड़ रुपये खर्च आएगा। कुल दस कोचों पर करीब 800 करोड़ रुपये खर्च होगा। देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की स्पीड 29 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है, लेकिन कालका शिमला मार्ग पर कर्व के चलते इसे अधिकतम 27.5 किलोमीटर प्रतिघंटा के रफ्तार से चलाया जाएगा। इसमें 48 डिग्री के कई कर्व शामिल हैं। इसके चलते ट्रेन को ज्यादा रफ्तार से नहीं दौड़ाया जा सकता। हाइड्रोजन ट्रेन की खास बात यह है कि ट्रेन हाइड्रोजन ईंधन सेल का उपयोग करेगी जो कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं करती है। इसके परिणामस्वरूप शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है। इससे पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचेगा।
हाइड्रोजन ट्रेन की खासियत
- हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनें आरामदायक होती हैं
- हर कोच से अंदर ही अंदर दूसरे कोच में आ जा सकेंगे।
- हाइड्रोजन ट्रेनों को कहीं भी तैनात किया जा सकता है। मौजूदा ट्रेनों और लाइनों में भी लगाया जा सकता है।
- इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तुलना में यह दस गुना अधिक दूरी तय करती है और इसमें ईंधन भरने में भी अधिक समय नहीं लगता है।
- ईंधन सेल की लागत और रखरखाव में कम खर्च आते हैं।
- हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों में आवश्यक बिजली की आपूर्ति एक ईंधन सेल के माध्यम से की जाती है, जो हवा में ऑक्सीजन के साथ ट्रेन की छत पर स्टोर की गई हाइड्रोजन को मिलाकर ऊर्जा उत्पन्न करती है। इस प्रक्रिया में कार्बन-डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता है।
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- हाइड्रोजन ईंधन सेल ट्रेनों से 29 किमी/घंटा की अधिकतम स्पीड पर 1000 किलोमीटर तक की लंबी दूरी तय की जा सकती है।
- इसके चलने पर अधिक आवाज नहीं निकलता है।
हाइड्रोजन का उपयोग करने वाली रेल को हाइड्रेल कहा जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि जो रेल वाहनों के सभी रूपों का वर्णन करता है। हाइड्रिल प्रणोदन के लिए हाइड्रोजन की रासायनिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं, या तो हाइड्रोजन आंतरिक दहन इंजन में हाइड्रोजन को जलाकर या इलेक्ट्रिक मोटर्स को चलाने के लिए ईंधन सेल में ऑक्सीजन के साथ हाइड्रोजन की प्रतिक्रिया करके इसे उपयोग में लाया जाता है।
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एक कोच पर करीब 80 करोड़ रुपये खर्च आएगा, 10 कोच होंगे तैयार
अंबाला मंडल के डीआरएम एमएस भाटिया ने बताया कि मेक इन इंडिया योजना के तहत भारत के चेन्नई स्थित आईसीएफ (इंटीग्रल कोच फैक्ट्री) में हाइड्रोजन कोच को डिजाइन और निर्मित किया जाएगा। पहले चरण में दस कोच डिजाइन किए जाएंगे। एक हाइड्रोजन कोच के निर्माण पर करीब 80 करोड़ रुपये खर्च आएगा। कुल दस कोचों पर करीब 800 करोड़ रुपये खर्च होगा। देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की स्पीड 29 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है, लेकिन कालका शिमला मार्ग पर कर्व के चलते इसे अधिकतम 27.5 किलोमीटर प्रतिघंटा के रफ्तार से चलाया जाएगा। इसमें 48 डिग्री के कई कर्व शामिल हैं। इसके चलते ट्रेन को ज्यादा रफ्तार से नहीं दौड़ाया जा सकता। हाइड्रोजन ट्रेन की खास बात यह है कि ट्रेन हाइड्रोजन ईंधन सेल का उपयोग करेगी जो कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं करती है। इसके परिणामस्वरूप शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है। इससे पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचेगा।
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हाइड्रोजन ट्रेन की खासियत
- हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनें आरामदायक होती हैं
- हर कोच से अंदर ही अंदर दूसरे कोच में आ जा सकेंगे।
- हाइड्रोजन ट्रेनों को कहीं भी तैनात किया जा सकता है। मौजूदा ट्रेनों और लाइनों में भी लगाया जा सकता है।
- इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तुलना में यह दस गुना अधिक दूरी तय करती है और इसमें ईंधन भरने में भी अधिक समय नहीं लगता है।
- ईंधन सेल की लागत और रखरखाव में कम खर्च आते हैं।
- हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों में आवश्यक बिजली की आपूर्ति एक ईंधन सेल के माध्यम से की जाती है, जो हवा में ऑक्सीजन के साथ ट्रेन की छत पर स्टोर की गई हाइड्रोजन को मिलाकर ऊर्जा उत्पन्न करती है। इस प्रक्रिया में कार्बन-डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता है।
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- हाइड्रोजन ईंधन सेल ट्रेनों से 29 किमी/घंटा की अधिकतम स्पीड पर 1000 किलोमीटर तक की लंबी दूरी तय की जा सकती है।
- इसके चलने पर अधिक आवाज नहीं निकलता है।
हाइड्रोजन का उपयोग करने वाली रेल को हाइड्रेल कहा जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि जो रेल वाहनों के सभी रूपों का वर्णन करता है। हाइड्रिल प्रणोदन के लिए हाइड्रोजन की रासायनिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं, या तो हाइड्रोजन आंतरिक दहन इंजन में हाइड्रोजन को जलाकर या इलेक्ट्रिक मोटर्स को चलाने के लिए ईंधन सेल में ऑक्सीजन के साथ हाइड्रोजन की प्रतिक्रिया करके इसे उपयोग में लाया जाता है।