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Panchkula News: गंभीर बीमारी से जूझ रहे बेटे की देखभाल के लिए उम्रकैदी को 8 सप्ताह की पैरोल

Thu, 29 Oct 2026 10:56 PM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 29 Oct 2026 10:56 PM IST
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Life convict granted 8 weeks parole to care for son suffering from serious illness
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने गंभीर आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित बेटे की देखभाल के लिए उम्रकैद की सजा काट रहे एक व्यक्ति को आठ सप्ताह की पैरोल देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि कैद के दौरान भी मानवीय पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पैरोल पर निर्णय लेते समय दोषी के अपराध के साथ परिवार की वास्तविक परिस्थितियों और बच्चे की चिकित्सा जरूरतों पर विचार जरूरी है।
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कैदी को पैरोल देने से इन्कार का आधार केवल आशंकाएं नहीं हो सकतीं। प्रशासन को उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का निष्पक्ष आकलन करना चाहिए। बच्चे की बीमारी और उसकी देखभाल की जरूरतों पर विचार किए बिना पैरोल आवेदन खारिज करना उचित नहीं है।
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याचिकाकर्ता का बेटा ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नामक गंभीर आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित है। यह बीमारी समय के साथ बढ़ती जाती है, जिससे मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होती हैं। चिकित्सकीय प्रमाणपत्र के अनुसार, बच्चे में 50 फीसदी दिव्यांगता है। उसकी स्थिति के लिए लगातार देखभाल और माता-पिता की भागीदारी आवश्यक बताई गई।
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जिला मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द :

पिता ने बेटे की देखभाल के लिए पैरोल मांगी थी लेकिन जिला मजिस्ट्रेट ने 21 मई को उसका आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया। अदालत ने पाया कि प्रशासनिक आदेश में बच्चे की बीमारी, देखभाल की जरूरतों और परिवार की परिस्थितियों का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करते हुए उम्रकैदी को आठ सप्ताह की पैरोल प्रदान की।



मानवीय दृष्टिकोण पर जोर :

हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी स्थिति का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि अस्पताल में भर्ती होने मात्र से मरीज की देखभाल की सभी जरूरतें पूरी नहीं होतीं। कई सरकारी अस्पतालों में मरीजों को परिजनों के सहयोग की आवश्यकता होती है। प्रशासन ने यह आकलन नहीं किया कि बच्चे की देखभाल के लिए परिवार में कोई अन्य सदस्य उपलब्ध है या नहीं। अदालत ने जोर दिया कि ऐसे मामलों में निर्णय लेते समय मानवीय दृष्टिकोण और उपलब्ध चिकित्सकीय साक्ष्यों को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
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