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Panchkula News: सुधीर परमार केस में जांच एजेंसियों की फजीहत, डिजिटल सबूत कोर्ट में फेल
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व्हाट्सएप चैट और ऑडियो रिकॉर्डिंग नहीं टिके साक्ष्य, फॉरेंसिक रिपोर्ट ने खोली पोल
माई सिटी रिपोर्टर
पंचकूला। हरियाणा के चर्चित पूर्व विशेष सीबीआई जज सुधीर परमार से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। विशेष सीबीआई अदालत ने डिजिटल सबूतों को अविश्वसनीय मानते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया, जिससे एंटी करप्शन ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय की जांच पर गंभीर प्रश्न उठे हैं।
अदालत ने 84 पन्नों के आदेश में कहा कि जिस डिजिटल साक्ष्य पर पूरा मामला टिका था, वह कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरा। व्हाट्सएप चैट और ऑडियो रिकॉर्डिंग जैसे सबूत अदालत में टिक नहीं पाए।
डिजिटल सबूत का आधार ही निकला खोखला
जांच एजेंसियों का दावा था कि व्हाट्सएप चैट के जरिए रिश्वत की बातचीत हुई लेकिन फॉरेंसिक जांच में यह साबित नहीं हो सका। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत रिकॉर्डिंग मूल नहीं थीं और जिन डिवाइस से इन्हें रिकॉर्ड किया गया, वे उपलब्ध ही नहीं कराए गए। ऐसे में छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सका।
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फोन में नहीं मिली कथित चैट
छापे के दौरान जब्त किए गए मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच में वह व्हाट्सएप चैट ही नहीं मिली, जो जांच का मुख्य आधार थी। एजेंसियों ने डेटा डिलीट होने की बात कही, लेकिन फॉरेंसिक विशेषज्ञ डिलीट डेटा भी रिकवर कर लेते हैं—इसके बावजूद कोई चैट नहीं मिली।
वॉइस सैंपल में भी नहीं हुआ मिलान
ऑडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर वॉइस सैंपल का मिलान कराया गया, लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट में शोर अधिक होने के कारण आवाज की पहचान संभव नहीं हो सकी। कुछ रिकॉर्डिंग में तो पर्याप्त शब्द ही नहीं थे, जिससे तुलना नहीं हो पाई।
वेतन वृद्धि का दावा भी गलत साबित
अभियोजन पक्ष ने अजय परमार की नौकरी और वेतन वृद्धि को रिश्वत से जोड़ा, लेकिन जांच में सामने आया कि उनकी नियुक्ति पहले ही हो चुकी थी और वेतन वृद्धि कंपनी की सामान्य प्रक्रिया के तहत हुई थी।
बेनामी संपत्ति के आरोप भी नहीं टिके
जांच एजेंसियां यह साबित नहीं कर सकीं कि जिन संपत्तियों को बेनामी बताया गया, वे रिश्वत के पैसे से खरीदी गई थीं। अदालत ने पाया कि संबंधित व्यक्तियों के पास आय के स्वतंत्र स्रोत मौजूद थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर आरोप तय नहीं किए जा सकते। ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया, जिससे जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।
यह है मामला
मामला भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग से जुड़ा है जिसमें पूर्व विशेष सीबीआई न्यायाधीश सुधीर परमार मुख्य आरोपी थे। आरोप था कि न्यायाधीश रहते हुए उन्होंने एमथ्रीएम समूह के मालिकों और आईआरईओ समूह के ललित गोयल को उनके खिलाफ लंबित ईडी और सीबीआई के मामलों में अनुचित लाभ पहुंचाया। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के अनुसार परमार ने इन आरोपियों की मदद के बदले करोड़ों रुपये की रिश्वत मांगी थी। साथ ही, उन पर अपने भतीजे को एमथ्रीएम समूह में ऊंचे वेतन पर कानूनी सलाहकार रखवाने का भी आरोप था। जांच एजेंसी ने व्हाट्सएप चैट और कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग को आधार बनाकर यह दावा किया कि फैसलों को प्रभावित करने के लिए बड़ी डील हुई थी। हालांकि, पर्याप्त और पुख्ता सबूतों के अभाव में पंचकूला की विशेष अदालत ने हाल ही में सभी आरोपियों को बरी कर दिया है।
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माई सिटी रिपोर्टर
पंचकूला। हरियाणा के चर्चित पूर्व विशेष सीबीआई जज सुधीर परमार से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। विशेष सीबीआई अदालत ने डिजिटल सबूतों को अविश्वसनीय मानते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया, जिससे एंटी करप्शन ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय की जांच पर गंभीर प्रश्न उठे हैं।
अदालत ने 84 पन्नों के आदेश में कहा कि जिस डिजिटल साक्ष्य पर पूरा मामला टिका था, वह कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरा। व्हाट्सएप चैट और ऑडियो रिकॉर्डिंग जैसे सबूत अदालत में टिक नहीं पाए।
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डिजिटल सबूत का आधार ही निकला खोखला
जांच एजेंसियों का दावा था कि व्हाट्सएप चैट के जरिए रिश्वत की बातचीत हुई लेकिन फॉरेंसिक जांच में यह साबित नहीं हो सका। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत रिकॉर्डिंग मूल नहीं थीं और जिन डिवाइस से इन्हें रिकॉर्ड किया गया, वे उपलब्ध ही नहीं कराए गए। ऐसे में छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सका।
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फोन में नहीं मिली कथित चैट
छापे के दौरान जब्त किए गए मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच में वह व्हाट्सएप चैट ही नहीं मिली, जो जांच का मुख्य आधार थी। एजेंसियों ने डेटा डिलीट होने की बात कही, लेकिन फॉरेंसिक विशेषज्ञ डिलीट डेटा भी रिकवर कर लेते हैं—इसके बावजूद कोई चैट नहीं मिली।
वॉइस सैंपल में भी नहीं हुआ मिलान
ऑडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर वॉइस सैंपल का मिलान कराया गया, लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट में शोर अधिक होने के कारण आवाज की पहचान संभव नहीं हो सकी। कुछ रिकॉर्डिंग में तो पर्याप्त शब्द ही नहीं थे, जिससे तुलना नहीं हो पाई।
वेतन वृद्धि का दावा भी गलत साबित
अभियोजन पक्ष ने अजय परमार की नौकरी और वेतन वृद्धि को रिश्वत से जोड़ा, लेकिन जांच में सामने आया कि उनकी नियुक्ति पहले ही हो चुकी थी और वेतन वृद्धि कंपनी की सामान्य प्रक्रिया के तहत हुई थी।
बेनामी संपत्ति के आरोप भी नहीं टिके
जांच एजेंसियां यह साबित नहीं कर सकीं कि जिन संपत्तियों को बेनामी बताया गया, वे रिश्वत के पैसे से खरीदी गई थीं। अदालत ने पाया कि संबंधित व्यक्तियों के पास आय के स्वतंत्र स्रोत मौजूद थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर आरोप तय नहीं किए जा सकते। ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया, जिससे जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।
यह है मामला
मामला भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग से जुड़ा है जिसमें पूर्व विशेष सीबीआई न्यायाधीश सुधीर परमार मुख्य आरोपी थे। आरोप था कि न्यायाधीश रहते हुए उन्होंने एमथ्रीएम समूह के मालिकों और आईआरईओ समूह के ललित गोयल को उनके खिलाफ लंबित ईडी और सीबीआई के मामलों में अनुचित लाभ पहुंचाया। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के अनुसार परमार ने इन आरोपियों की मदद के बदले करोड़ों रुपये की रिश्वत मांगी थी। साथ ही, उन पर अपने भतीजे को एमथ्रीएम समूह में ऊंचे वेतन पर कानूनी सलाहकार रखवाने का भी आरोप था। जांच एजेंसी ने व्हाट्सएप चैट और कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग को आधार बनाकर यह दावा किया कि फैसलों को प्रभावित करने के लिए बड़ी डील हुई थी। हालांकि, पर्याप्त और पुख्ता सबूतों के अभाव में पंचकूला की विशेष अदालत ने हाल ही में सभी आरोपियों को बरी कर दिया है।