आईजी भारती अरोड़ा हुई सेवानिवृत्त: कहा-घर में अशुद्ध धन न ले जाएं, इससे तकलीफें भी आएंगी
भारती अरोड़ा ने बताया कि सेवानिवृत्ति के बाद वह वृंदावन में श्री कृष्ण की भक्ति में लीन होंगी। 23 साल पहले वह आईपीएस अधिकारी के तौर पर हरियाणा में आई थीं। उन्होंने कहा कि हरियाणा की भूमि साधारण नहीं बल्कि दिव्य है। हरियाणा का मतलब हरि का आना है। इसी कारण यहीं पर उन्हें श्री कृष्ण भक्ति को जाना।
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भगवान श्री कृष्ण की भक्ति के लिए दस साल पहले वीआरएस लेने वाली आईजी भारती अरोड़ा को भक्ति की लग्न हरियाणा में आने के बाद लगी। आईपीएस के दौरान जब वह पहली बार हरियाणा आई तो उन्होंने हरियाणा के बारे में जाना। हरियाणा की भूमि साधारण नहीं बल्कि दिव्य है। हरियाणा का मतलब हरि का आना है। इसी कारण यहीं पर उन्हें श्री कृष्ण भक्ति को जाना। इससे पहले, उन्हें कभी इस तरह का महसूस नहीं हुआ।
भारती अरोड़ा बुधवार को आधिकारिक तौर पर सेवानिवृत्त हो गईं। मूलरूप से मध्य प्रदेश की रहने वाली भारती अरोड़ा ने बातचीत के दौरान बताया कि सेवानिवृत्ति के बाद वह वृंदावन में श्री कृष्ण की भक्ति में लीन होंगी। 23 साल पहले वह आईपीएस अधिकारी के तौर पर हरियाणा में आई थीं। इस दौरान वह महाभारत की धरती कुरुक्षेत्र, करनाल में बतौर एसपी रहने के दौरान कई जिलों में तैनात रही हैं। इसी दौरान उन्हें श्री कृष्ण के बारे में विस्तार से जाना। कुछ दिव्य संतों के मार्गदर्शन के चलते ही वह भक्ति मार्ग पर जा रही हैं।
पुलिस कर्मचारियों को अपने संदेश में अरोड़ा ने कहा कि वह शुरू से ही पुलिस कर्मचारियों को कहती रही हैं कि कभी भी अपने घर में अशुद्ध धन न जाने दें। क्योंकि अगर गलत धन आएगा तो उसके साथ साथ समस्याएं और परेशानियां आएंगी। कर्म का सिद्धांत अटल है। जो जैसा कर्म करेगा, उसे उसका फल जरूर मिलेगा।
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जहां तक पुलिस वर्दी की बात है ये हमारे लिए गर्व की बात है, क्योंकि पुलिस के पास कोई खुशी नहीं आता, बल्कि तकलीफ में आता है। इसलिए पुलिस के पास सेवा और न्याय करने का मौका होता है, इसे गंवाना नहीं चाहिए। किसी गरीब की बददुआ न लें, बल्कि दुआओं के लिए काम करें।
मैं डीजीपी से भी बड़ी वस्तु पाना चाहती हूं
अरोड़ा ने कहा कि वह पुलिस में डीजीपी नहीं बनना चाहती, क्योंकि अब वह इससे भी बड़ी, गंभीर और दुलर्भ वस्तु पाना चाहती हैं। मैंने बहुत से डीजीपी देखे हैं, उनको पद छोड़ते हुए भी देखा है। बड़ी से बड़ी पोस्ट पर बैठा व्यक्ति या फिर दुनिया का कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं है, बल्कि दुखी हैं। जिन सांसारिक चीजों को हम सुख बताते हैं, असल में वे कंकड़ हैं। जिन्होंने नाम धारण किया है, वे ही सुखी रहे हैं। उन्हीं को परम आनंद की प्राप्ति हुई है। वह थोड़े समय के लिए सुख नहीं चाहती बल्कि चिरस्थायी सुख की प्राप्ति के लिए प्रयास कर रही हैं।