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Panchkula News: सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड के आरोपी को भगाने में मदद, एएसआई प्रीतपाल को जमानत से हाईकोर्ट का इन्कार
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चंडीगढ़। शुभदीप सिंह उर्फ सिद्धू मूसेवाला की हत्या के आरोपी गैंगस्टर को पुलिस हिरासत से फरार होने में मददगार एएसआई को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने जमानत से इन्कार कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि याची कोई आम आदमी होता तो जमानत देने पर विचार किया जा सकता था, लेकिन कानून का रक्षक जिसने अपने हित के लिए कानून का उल्लंघन किया, ऐसा व्यक्ति राहत का हकदार नहीं है। याचिका दाखिल करते हुए एएसआई प्रीतपाल सिंह ने हाईकोर्ट से नियमित जमानत देने की मांंग की थी। याची ने कहा था कि वह 1 साल 1 माह से जेल में मौजूद है। इस मामले में ट्रायल पूरा होने में समय लगेगा और ऐसे में उसे नियमित जमानत दी जाए। हाईकोर्ट ने याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि याची का काम बदमाशों के हाथों कानून-व्यवस्था की रक्षा करना है, जबकि पुलिस विभाग में काम करने के बावजूद याचिकाकर्ता ने न केवल विभाग को, बल्कि आम जनता के हितों के खिलाफ काम किया।
सीसीटीवी फुटेज के अनुसार वह गैंगस्टर को पुलिस स्टेशन से अपने निजी कार में अपने आवासीय क्वार्टर में लेकर गया और वहां से गैंगस्टर भाग गया। याचिकाकर्ता का काम पुलिस थाने में विचाराधीन कैदी से पूछताछ करना था, ताकि उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों के पीछे की सच्चाई का पता लगाया जा सके।
जमानत का विरोध करते हुए, सरकार ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता एक पुलिस अधिकारी था। पूछताछ के लिए उसे एक विचाराधीन गैंगस्टर की हिरासत सौंपी गई थी, लेकिन याचिकाकर्ता ने उक्त विचाराधीन गैंगस्टर दीपक उर्फ टीनू को भागने में मदद की। कोर्ट ने कहा याचिकाकर्ता जिसका काम यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी अनधिकृत हथियार का उपयोग न करे या उसे अपने कब्जे में न रखे, वह खुद अपने सरकारी मकान में अवैध हथियार रखता था, जिसे उसकी गिरफ्तारी के बाद उसके निशानदेही पर बरामद किया गया।
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कोर्ट ने कहा कि यह तथ्य दर्शाता है कि याचिकाकर्ता किस तरह का व्यक्ति है। आरोपी के आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, भले ही वह एक साल की सजा काट चुका हो। कानून का रक्षक जिसने कानून का उल्लंघन करते हुए असामाजिक तत्वों की मदद की है, उसे नियमित जमानत देकर समाज में वापस नहीं लाया जाना चाहिए।
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सीसीटीवी फुटेज के अनुसार वह गैंगस्टर को पुलिस स्टेशन से अपने निजी कार में अपने आवासीय क्वार्टर में लेकर गया और वहां से गैंगस्टर भाग गया। याचिकाकर्ता का काम पुलिस थाने में विचाराधीन कैदी से पूछताछ करना था, ताकि उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों के पीछे की सच्चाई का पता लगाया जा सके।
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जमानत का विरोध करते हुए, सरकार ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता एक पुलिस अधिकारी था। पूछताछ के लिए उसे एक विचाराधीन गैंगस्टर की हिरासत सौंपी गई थी, लेकिन याचिकाकर्ता ने उक्त विचाराधीन गैंगस्टर दीपक उर्फ टीनू को भागने में मदद की। कोर्ट ने कहा याचिकाकर्ता जिसका काम यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी अनधिकृत हथियार का उपयोग न करे या उसे अपने कब्जे में न रखे, वह खुद अपने सरकारी मकान में अवैध हथियार रखता था, जिसे उसकी गिरफ्तारी के बाद उसके निशानदेही पर बरामद किया गया।
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कोर्ट ने कहा कि यह तथ्य दर्शाता है कि याचिकाकर्ता किस तरह का व्यक्ति है। आरोपी के आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, भले ही वह एक साल की सजा काट चुका हो। कानून का रक्षक जिसने कानून का उल्लंघन करते हुए असामाजिक तत्वों की मदद की है, उसे नियमित जमानत देकर समाज में वापस नहीं लाया जाना चाहिए।